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मौतों का आंकड़ा 512 पार, संकट से निपटने के लिए डब्लूएचओ और यूनिसेफ की आपातकालीन जंग
दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश इस समय हाल के दशकों के सबसे गंभीर स्वास्थ्य संकटों में से एक का सामना कर रहा है। देश में अत्यधिक संक्रामक और जानलेवा बीमारी 'खसरा' ने महामारी का रूप ले लिया है। स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में खसरे और इसके जैसे लक्षणों के कारण मरने वाले बच्चों की संख्या बढ़कर 512 तक पहुंच गई है। महज चार दिन पहले यह आंकड़ा 480 पर था, जो यह दर्शाता है कि संक्रमण कितनी तेजी से मासूमों की जान ले रहा है।
स्वास्थ्य महानिदेशालय के बुलेटिन के मुताबिक, देश भर में अब तक 62,507 संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं, जबकि प्रयोगशाला जांच में 8,494 पुष्ट मामलों की पहचान हो चुकी है। स्थिति की भयावहता को देखते हुए बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के साथ मिलकर युद्ध स्तर पर एक बड़ा आपातकालीन सामूहिक टीकाकरण अभियान शुरू किया है।
चार दिनों में खौफनाक उछाल: अस्पतालों में बेड कम पड़े
बांग्लादेश में खसरे की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल पिछले 24 घंटों में ही कई बच्चों की मौत दर्ज की गई है। चार दिनों के भीतर ही मरने वाले बच्चों की संख्या 480 से उछलकर 512 हो गई है।
राजधानी ढाका और सिलेट संभाग इस समय इस महामारी के सबसे बड़े केंद्र बने हुए हैं। कुल मौतों में से अकेले ढाका जिले में 200 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। ढाका के संक्रामक रोग अस्पताल और देश के अन्य बड़े सरकारी अस्पतालों में हालात बेहद चिंताजनक हैं:
• वार्डों में पैर रखने की जगह नहीं: अस्पतालों में बच्चों के लिए विशेष खसरा वार्ड बनाए गए हैं, लेकिन मरीजों की बढ़ती संख्या के सामने वे छोटे पड़ रहे हैं।
• ICU बेड की भारी किल्लत: खसरे के गंभीर मामलों में बच्चों को सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया जैसी जटिलताएं हो रही हैं, जिसके कारण उन्हें गहन चिकित्सा इकाई की आवश्यकता है, लेकिन बेड खाली नहीं मिल रहे हैं।
• डॉक्टरों की छुट्टियां रद्द: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आपातकालीन और खसरा सेवाओं में लगे डॉक्टरों और नर्सों की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं।
महामारी के पीछे की मुख्य वजह: वैक्सीन की भारी कमी और राजनीतिक उथल-पुथल
वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश ने इससे पहले खसरे के उन्मूलन की दिशा में काफी सराहनीय प्रगति की थी। वर्ष 2025 में पूरे देश में खसरे के बेहद मामूली मामले दर्ज किए गए थे। लेकिन अचानक 2026 में आई इस भयानक लहर के पीछे व्यवस्थागत खामियां जिम्मेदार हैं:
1. टीकों का स्टॉक खत्म होना
यूनिसेफ की बांग्लादेश प्रतिनिधि राणा फ्लावर्स के अनुसार, संस्था वर्ष 2024 से ही सरकार को चेतावनी दे रही थी कि देश में खसरे के टीकों की कमी हो रही है। समय रहते टीकों का आयात या बफर स्टॉक नहीं बनाया गया, जिसके कारण 2024-2025 के दौरान लाखों बच्चे नियमित टीकाकरण से वंचित रह गए।
2. राजनीतिक अस्थिरता और नागरिक विद्रोह
वर्ष 2024 के उत्तरार्ध में बांग्लादेश में हुए बड़े राजनीतिक उथल-पुथल और तख्तापलट के कारण देश की प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवाएं हफ्तों तक ठप रहीं। इस अराजकता और तालाबंदी की वजह से सुदूर ग्रामीण इलाकों और शरणार्थी शिविरों में बच्चों को खसरे की खुराकें समय पर नहीं दी जा सकीं। इसी सुरक्षा अंतर का फायदा उठाकर वायरस ने तेजी से बच्चों को अपनी चपेट में ले लिया।
वैश्विक संस्थाओं के सहयोग से आपातकालीन अभियान
स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाता देख, बांग्लादेश स्वास्थ्य मंत्रालय ने डब्लूएचओ, यूनिसेफ और गावी (GAVI - वैक्सीन एलायंस) के साथ मिलकर 6 महीने से 5 वर्ष तक के बच्चों के लिए 'खसरा-रुबेला (MR) आपातकालीन टीकाकरण अभियान' शुरू किया है।
राणा फ्लावर्स (यूनिसेफ प्रमुख, बांग्लादेश): "यूनिसेफ और सहयोगी संस्थाएं अब तक लगभग 18.4 मिलियन (1.84 करोड़) बच्चों को वैक्सीन की कम से कम एक खुराक दे चुकी हैं। हमारा लक्ष्य हर उस बच्चे तक पहुंचना है जो इस सुरक्षा चक्र से छूट गया था।"
हालांकि, स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि इस बड़े पैमाने पर किए जा रहे टीकाकरण का पूरा असर जमीन पर दिखने में अभी कुछ महीनों का समय लग सकता है, क्योंकि जो बच्चे पहले से संक्रमित हो चुके हैं या वायरस के संपर्क में आ चुके हैं, उनकी स्थिति नाजुक बनी हुई है।
रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों पर मंडराता दोहरा खतरा
यह महामारी केवल बांग्लादेशी मूल के नागरिकों तक सीमित नहीं है। कॉक्स बाजार में रह रहे लगभग 10 लाख रोहिंग्या शरणार्थियों के शिविरों में भी खसरे ने अपने पैर पसार लिए हैं। अत्यधिक घनी आबादी और कुपोषण के शिकार बच्चों के कारण इन शिविरों में वायरस के फैलने की गति बहुत तेज है। रेड क्रेसेंट सोसाइटी और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस इन शिविरों में घर-घर जाकर बच्चों को ढूंढ रहे हैं और उन्हें आइसोलेट करने तथा टीका लगाने का काम कर रहे हैं।
खसरे से जुड़ी जटिलताएं और मृत्यु दर का कारण
खसरा एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से हवा के जरिए फैलती है। हालांकि इसे एक सामान्य बीमारी माना जाता है, लेकिन कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली और कुपोषित बच्चों में यह घातक हो जाती है। खसरे का कोई विशिष्ट एंटीवायरल इलाज नहीं है; केवल लक्षणों का प्रबंधन और विटामिन-A की खुराक देकर ही बच्चों को बचाया जा सकता है। इसलिए, इस बीमारी से बचने का एकमात्र अचूक हथियार वैक्सीन की दो खुराकें ही हैं।
निष्कर्ष
बांग्लादेश में खसरे से 512 बच्चों की मौत इस बात का एक कड़वा और दर्दनाक सबक है कि स्वास्थ्य प्रणालियों में जरा सी भी लापरवाही या टीकों की कमी कितनी बड़ी तबाही ला सकती है। जब तक हर एक बच्चे का टीकाकरण सुनिश्चित नहीं हो जाता, तब तक यह खतरा टलने वाला नहीं है। वर्तमान अंतरिम सरकार और वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाओं का संयुक्त प्रयास सराहनीय है, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती सुदूर इलाकों में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और भविष्य में टीकों की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने की है, ताकि किसी भी मासूम को इस पूरी तरह से रोके जा सकने वाली बीमारी के कारण अपनी जान न गंवानी पड़े।
