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अल-नीनो का वैश्विक प्रकोप: यूरोप और अमेरिका में रिकॉर्ड-तोड़ तापमान और 'गर्म रातों' का संकट

26-06-2026

वैश्विक जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो के संयुक्त प्रभाव के कारण इस समय पूरा यूरोप और अमेरिका एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक संकट से जूझ रहे हैं। मौसम विज्ञान संगठनों ने इन क्षेत्रों में भीषण और जानलेवा हीटवेव (लू) की सख्त चेतावनी जारी की है। इस साल की गर्मी ने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, जिससे न केवल आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ है, बल्कि स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर भी गंभीर संकट मंडराने लगा है।

यूरोप और अमेरिका में रिकॉर्ड-तोड़ तापमान

यूरोप के जिन देशों को आमतौर पर ठंडी और सुहावनी जलवायु के लिए जाना जाता है, वे आज भट्टी की तरह तप रहे हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, महाद्वीप के एक बड़े हिस्से में तापमान सामान्य से 3 डिग्री से लेकर 10 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया जा रहा है।

प्रमुख देशों की स्थिति:

• स्पेन: स्पेन इस समय इस हीटवेव का मुख्य केंद्र बना हुआ है, जहां पारा 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। यह तापमान वहां के स्थानीय निवासियों और कृषि क्षेत्र के लिए एक आपदा जैसा है।

• फ्रांस: फ्रांस के कई हिस्सों में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है, जहां हाल ही में न्यूनतम और औसत तापमान के स्तर पर अप्रत्याशित रूप से 29.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है।

• रेड अलर्ट : स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, जर्मनी और इटली समेत 20 से ज्यादा देशों में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है। नागरिकों को बिना वजह घरों से बाहर न निकलने की सलाह दी जा रही है।

अल-नीनो क्या है और यह गर्मी कैसे बढ़ा रहा है?

इस भीषण हीटवेव के पीछे सबसे बड़ा कारण 'अल-नीनो' के प्रभाव को माना जा रहा है।

अल-नीनो : यह एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। जब समुद्र की सतह गर्म होती है, तो इसका असर वैश्विक वायुमंडल पर पड़ता है।

इसके प्रभाव से दुनिया भर के मौसम का चक्र बदल जाता है। इसके कारण कुछ हिस्सों में अत्यधिक सूखा और भीषण गर्मी पड़ती है, तो कुछ हिस्सों में भारी बाढ़ आती है। इस बार अल-नीनो के कारण अटलांटिक और यूरोपीय वायुमंडल में गर्म हवाओं के थपेड़े बन गए हैं, जो ठंडी हवाओं को रोक रहे हैं और गर्मी को एक ही जगह पर कैद कर रहे हैं।

सबसे बड़ी चिंता: 'गर्म रातें' 

मौसम वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के लिए इस हीटवेव में सबसे चिंताजनक पहलू दिन का उच्च तापमान नहीं, बल्कि गर्म रातें हैं। जब रात का तापमान भी एक निश्चित स्तर से नीचे नहीं गिरता, तो उसे वैज्ञानिक भाषा में 'ट्रॉपिकल नाइट्स' कहा जाता है।

गर्म रातें क्यों खतरनाक हैं?

आम तौर पर, दिनभर की भीषण गर्मी के बाद रात के समय मानव शरीर को ठंडक मिलती है, जिससे शरीर रिकवर हो पाता है। लेकिन जब रातें भी गर्म रहने लगती हैं, तो:

1. शरीर का आंतरिक तापमान कम नहीं हो पाता।

2. दिल और फेफड़ों को शरीर को ठंडा रखने के लिए लगातार अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है।

3. इससे गहरी नींद नहीं आती, जिससे मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ती है।

संवेदनशील वर्गों पर गंभीर स्वास्थ्य प्रभाव

इस भीषण गर्मी का सबसे बुरा असर समाज के सबसे कमजोर और संवेदनशील वर्गों पर पड़ रहा है:

• बुजुर्ग : बढ़ती उम्र के साथ शरीर की तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता कम हो जाती है। गर्म रातों के कारण बुजुर्गों में हीट स्ट्रोक और कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) का खतरा कई गुना बढ़ गया है।

• बच्चे : बच्चों का शरीर वयस्कों की तुलना में तेजी से गर्म होता है और उन्हें डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) का खतरा सबसे पहले होता है।

• गर्भवती महिलाएं : अत्यधिक गर्मी के संपर्क में रहने से गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव और उच्च रक्तचाप जैसी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।

इसके अलावा, जो लोग पहले से ही सांस की बीमारी या हृदय रोग से पीड़ित हैं, उनकी स्थिति इस मौसम में और अधिक बिगड़ रही है।

वैश्विक बुनियादी ढांचे और पर्यावरण पर असर

यह हीटवेव केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि देशों के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी एक बड़ी परीक्षा है:

• पावर ग्रिड पर दबाव: एयर कंडीशनिंग और कूलिंग सिस्टम के अत्यधिक उपयोग के कारण बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जिससे कई देशों में ब्लैकआउट (बिजली गुल होने) का खतरा मंडरा रहा है।

• जंगलों में आग : सूखे और अत्यधिक तापमान के कारण स्पेन, फ्रांस और अमेरिका के जंगलों में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे वन्यजीवों और पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है।

• जल संकट: नदियों और जलाशयों का पानी तेजी से सूख रहा है, जिससे पीने के पानी और कृषि के लिए संकट खड़ा हो गया है।

निष्कर्ष और बचाव के उपाय

यूरोप और अमेरिका में जारी यह हीटवेव इस बात का सीधा संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान की एक कड़वी हकीकत बन चुका है। अल-नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाएं जब ग्लोबल वार्मिंग के साथ मिलती हैं, तो उनके परिणाम इसी तरह विनाशकारी होते हैं।

इस स्थिति से निपटने के लिए सरकारों को अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर काम करना होगा। जहां एक ओर कूलिंग सेंटरों की स्थापना, स्वास्थ्य सेवाओं को अलर्ट पर रखना और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना तात्कालिक उपाय हैं; वहीं दूसरी ओर, कार्बन उत्सर्जन को कम करना और पर्यावरण संरक्षण के वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करना ही इसका एकमात्र स्थायी समाधान है।

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