• aayushfoundation@navnews.in

वैश्विक अविश्वास के घेरे में डोनाल्ड ट्रंप: प्यू रिसर्च 2026 के आंकड़ों का गहरा विश्लेषण

26-06-2026

प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी 2026 का 'ग्लोबल एटीट्यूड सर्वे' वैश्विक राजनीति में आ रहे एक बड़े और चौंकाने वाले बदलाव की ओर इशारा करता है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के शीर्ष पद पर बैठे डोनाल्ड ट्रंप के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दृष्टिकोण तेजी से नकारात्मक हुआ है। सर्वे के अनुसार, वैश्विक स्तर पर केवल 23 फीसदी लोगों ने माना कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मामलों को संभालने में ट्रंप की नेतृत्व क्षमता और उनकी सूझबूझ पर भरोसा है। इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया की लगभग तीन-चौथाई (76%) आबादी अमेरिकी नेतृत्व को लेकर गहरे संदेह में है।

यह गिरावट सिर्फ पश्चिमी देशों या पारंपरिक अमेरिकी सहयोगियों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे रणनीतिक रूप से बेहद करीबी मित्र देश में भी ट्रंप के प्रति जनता का भरोसा तेजी से डिगा है। जहाँ 2025 में 51% भारतीयों को ट्रंप की वैश्विक नीतियों पर अटूट विश्वास था, वहीं 2026 में यह आंकड़ा 12 प्रतिशत अंक गिरकर मात्र 39% रह गया है। यह डेटा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिकी विदेश नीति की जमीनी हकीकत और ट्रंप के फैसले दुनिया भर की जनता को रास नहीं आ रहे हैं।

सर्वे का दायरा और वैश्विक अविश्वास के प्रमुख बिंदु

प्यू रिसर्च का यह सर्वे दुनिया भर के 36 देशों में लगभग 42,000 से अधिक उत्तरदाताओं के बीच आयोजित किया गया था। इस सर्वे के निष्कर्ष बताते हैं कि दुनिया अब अमेरिका को एक 'भरोसेमंद वैश्विक भागीदार' के रूप में नहीं देख रही है। इसके पीछे कई प्रमुख वैश्विक मुद्दे और ट्रंप प्रशासन के कड़े फैसले जिम्मेदार रहे हैं:

1. टैरिफ और व्यापार युद्ध : ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत अन्य देशों पर लगाए जा रहे भारी व्यापारिक प्रतिबंधों और टैरिफ (सीमा शुल्क) को दुनिया भर में सबसे ज्यादा नापसंद किया गया है। भारत में केवल 18%, कनाडा में 17% और जर्मनी में मात्र 8% लोगों ने ट्रंप की आर्थिक नीतियों का समर्थन किया।

2. वैश्विक संघर्षों से निपटने का तरीका: रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट और ईरान के साथ बढ़ते तनाव को लेकर ट्रंप प्रशासन के रवैये ने दुनिया भर में असुरक्षा की भावना पैदा की है। सर्वे के मुताबिक, लगभग 72% से 76% वैश्विक आबादी ने इन युद्धों और विवादों में अमेरिकी मध्यस्थता या फैसलों पर असंतोष जताया है।

3. सहयोगियों के हितों की अनदेखी: यूरोप के कई देशों (जैसे फ्रांस और जर्मनी) में ट्रंप को लेकर भरोसा अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। अधिकांश लोगों का मानना है कि अमेरिका अब कोई भी कूटनीतिक फैसला लेते समय अपने सहयोगी देशों के हितों और वैश्विक स्थिरता की परवाह नहीं करता।

भारत में ट्रंप की साख को लगा बड़ा झटका

भारत और अमेरिका के संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं और दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच की केमिस्ट्री हमेशा चर्चा में रहती है। इसके बावजूद, भारतीय जनता के बीच ट्रंप का ग्राफ इतनी तेजी से गिरना कूटनीतिक हलकों के लिए एक बड़ा सरप्राइज है। 2025 के 51% के मुकाबले 2026 में केवल 39% भारतीयों का ट्रंप पर भरोसा जताना कई महत्वपूर्ण कारणों की ओर इशारा करता है:

• आर्थिक और व्यापारिक टकराव: ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय निर्यात और वस्तुओं पर लगाए गए सख्त टैरिफ ने भारतीय बाजार और यहाँ के नीति निर्माताओं को प्रभावित किया है। व्यापार के मोर्चे पर 'कड़ा रुख' अपनाने की ट्रंप की जिद ने भारतीय जनमानस में उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया है।

• वीजा और आव्रजन नीतियां: भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए अमेरिकी वीजा (विशेषकर H-1B वीजा) नियमों को कड़ा करना या उसमें बदलाव की अनिश्चितता ने भारत के मध्यम वर्ग के बीच अमेरिकी प्रशासन के प्रति अविश्वास को बढ़ाया है।

• रूसी कूटनीति का प्रभाव: भारतीय संदर्भ में एक और दिलचस्प आंकड़ा यह सामने आया कि जहां ट्रंप पर भरोसा 39% है, वहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर विश्वास रखने वाले भारतीयों की संख्या 51% है। भारत की पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा जरूरतों के मामले में रूस का लगातार साथ देना भारतीय जनता के नजरिए को प्रभावित करता है।

वैश्विक समीकरणों में बदलाव: जब किसी देश के राष्ट्रप्रमुख की साख गिरती है, तो इसका सीधा असर उस देश की सॉफ्ट पावर और वैश्विक गठबंधनों की मजबूती पर पड़ता है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी, जहां कभी अमेरिका को 80% से अधिक लोग भरोसेमंद मानते थे, आज यह आंकड़ा सिमटकर 35-37% के बीच रह गया है।

निष्कर्ष: अमेरिकी कूटनीति के लिए खतरे की घंटी

प्यू रिसर्च सेंटर का 2026 का यह सर्वे केवल डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत लोकप्रियता का पैमाना नहीं है, बल्कि यह इस बात का दस्तावेजी प्रमाण है कि 'एकतरफा राष्ट्रवाद' की नीति को दुनिया अब स्वीकार करने के मूड में नहीं है। 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा भले ही अमेरिकी घरेलू राजनीति में वोटों का ध्रुवीकरण करने में सफल रहा हो, लेकिन वैश्विक मंच पर इसने अमेरिका को अलग-थलग करने का काम किया है।

भारत जैसे रणनीतिक साझेदार देश में ट्रंप के प्रति भरोसे का कम होना वॉशिंगटन के नीति निर्माताओं के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। यदि अमेरिका को वैश्विक नेतृत्व की अपनी भूमिका को बचाए रखना है, तो उसे अपनी नीतियों में 'कठोरता' के बजाय 'सहयोग और संवेदनशीलता' को शामिल करना होगा। दुनिया अब एक ऐसे नायक की तलाश में है जो संकट के समय सबको साथ लेकर चल सके, न कि अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए वैश्विक स्थिरता को दांव पर लगा दे।

Share This News On Social Media

Facebook Comments

Related News