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दुनियाभर में हर साल 12 मई को नर्सेस के योगदान और उनको सम्मान प्रकट करने के लिए ये दिवस

12-05-2026

प्रत्येक वर्ष 12 मई को संपूर्ण विश्व में 'अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस डे' हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह दिन स्वास्थ्य सेवा के उस स्तंभ को समर्पित है, जो मरीजों की सेवा में अपनी रातों की नींद और व्यक्तिगत सुखों का त्याग कर देता है। एक डॉक्टर यदि जीवन बचाने का मार्ग प्रशस्त करता है, तो एक नर्स उस मार्ग पर मरीज का हाथ थामकर उसे पूर्ण स्वास्थ्य तक पहुँचाती है।

आज के इस विशेष लेख में हम जानेंगे कि आखिर 12 मई को ही यह दिवस क्यों मनाया जाता है, फ्लोरेंस नाइटिंगेल का इस क्षेत्र में क्या योगदान है और आधुनिक चिकित्सा जगत में नर्सों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।

12 मई का ऐतिहासिक महत्व: फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म

12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस डे मनाने के पीछे सबसे मुख्य कारण आधुनिक नर्सिंग की जननी फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्मदिवस है। उनका जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस शहर में हुआ था। एक संपन्न और कुलीन परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने ऐशो-आराम की जिंदगी के बजाय सेवा का मार्ग चुना।

'द लेडी विद द लैंप' की कहानी

फ्लोरेंस नाइटिंगेल को दुनिया 'द लेडी विद द लैंप' के नाम से जानती है। इसके पीछे एक मर्मस्पर्शी कारण है:

• क्रीमिया युद्ध (1853-1856): इस युद्ध के दौरान फ्लोरेंस ने घायल सैनिकों की सेवा के लिए एक टीम बनाई।

• अंधेरे में सेवा: रात के सन्नाटे में, जब सब सो जाते थे, तब फ्लोरेंस अपने हाथ में एक लालटेन (लैंप) लेकर घायल सैनिकों के पास जाती थीं और उनकी देखभाल करती थीं। सैनिकों के लिए वह किसी फरिश्ते से कम नहीं थीं।

• स्वच्छता का महत्व: उन्होंने साबित किया कि दवाइयों के साथ-साथ साफ-सफाई और सही वेंटिलेशन मरीजों के जीवित रहने की दर को कई गुना बढ़ा देता है।

नर्सिंग: एक संघर्षपूर्ण शुरुआत

आज नर्सिंग एक सम्मानजनक पेशा है, लेकिन 19वीं सदी में ऐसा नहीं था। उस दौर में नर्सिंग को निम्न स्तर का काम माना जाता था। फ्लोरेंस नाइटिंगेल को भी अपने परिवार के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।

1. कठिन प्रशिक्षण: उन्होंने समाज और परिवार के खिलाफ जाकर जर्मनी में नर्सिंग की ट्रेनिंग ली।

2. पहला अस्पताल: 1853 में उन्होंने लंदन में महिलाओं के लिए अपना पहला अस्पताल खोला, जहाँ उन्होंने मरीजों की सेवा के नए मानक स्थापित किए।

3. नर्सिंग स्कूल की स्थापना: 1860 में उन्होंने लंदन के सेंट थॉमस अस्पताल में 'नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल फॉर नर्स' की स्थापना की, जिसने नर्सिंग को एक पेशेवर और वैज्ञानिक स्वरूप दिया।

अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस डे का इतिहास

इस दिवस को औपचारिक रूप से मनाने की शुरुआत इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्सेस (ICN) द्वारा की गई थी।

• 1965: पहली बार इसे मनाने का प्रस्ताव रखा गया।

• 1974: आधिकारिक तौर पर 12 मई को 'अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस डे' घोषित किया गया।

• प्रत्येक वर्ष ICN द्वारा एक विशेष थीम (विषय) निर्धारित की जाती है, जो नर्सों के सामने आने वाली चुनौतियों और स्वास्थ्य प्रणाली में उनके योगदान पर केंद्रित होती है।

स्वास्थ्य प्रणाली में नर्सों की अपरिहार्य भूमिका

एक अस्पताल की कल्पना बिना नर्सों के करना असंभव है। वे स्वास्थ्य सेवा की 'बैकबोन' (रीढ़ की हड्डी) होती हैं।

1. भावनात्मक संबल और देखभाल

मरीज अक्सर अस्पताल के माहौल में अकेलापन और डर महसूस करता है। नर्सें न केवल समय पर दवा देती हैं, बल्कि एक माँ, बहन या मित्र की तरह मरीज का ढांढस भी बंधाती हैं। उनकी मुस्कान और सहानुभूति मरीज की आधी बीमारी दूर कर देती है।

2. 24/7 निगरानी

डॉक्टर अस्पताल में राउंड पर आते हैं और दवा लिख कर चले जाते हैं, लेकिन मरीज की स्थिति पर 24 घंटे नज़र रखना, ब्लड प्रेशर चेक करना और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्यवाही करना नर्सों की जिम्मेदारी होती है।

3. कोरोना काल में त्याग

कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने नर्सों के असली सामर्थ्य को देखा। जब लोग अपने प्रियजनों के पास जाने से डर रहे थे, तब नर्सें घंटों तक पीपीई किट पहनकर, बिना खाए-पिए मरीजों की जान बचा रही थीं। कई नर्सों ने इस जंग में अपनी जान तक गंवा दी।

आधुनिक चुनौतियाँ और सुधार की आवश्यकता

इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद, नर्सिंग पेशे को आज भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:

• वर्कलोड: कई देशों में नर्सों और मरीजों का अनुपात बहुत कम है, जिससे उन पर अत्यधिक मानसिक और शारीरिक दबाव रहता है।

• वेतन विसंगति: अक्सर उनके कठिन परिश्रम की तुलना में उन्हें उचित वेतन और सुविधाएं नहीं मिल पातीं।

• सम्मान की कमी: समाज के एक वर्ग में आज भी उन्हें डॉक्टर के सहायक के रूप में ही देखा जाता है, जबकि वे एक स्वतंत्र और पेशेवर स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं।

निष्कर्ष: हमारा दायित्व

'अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस डे' केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने जिस "निस्वार्थ सेवा" की ज्योति जलाई थी, उसे आज की नर्सें पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रही हैं।

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