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BHU ट्रॉमा सेंटर में बड़ी लापरवाही: पहचान के भ्रम में गलत ऑपरेशन, बुजुर्ग महिला की मौत

16-04-2026

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) का ट्रॉमा सेंटर, जो पूरे पूर्वांचल और पड़ोसी राज्यों के लिए जीवनदायिनी माना जाता है, आज अपनी एक गंभीर विफलता के कारण चर्चा में है। यहाँ भर्ती एक 71 वर्षीय महिला की मौत ने अस्पताल के सुरक्षा प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा दी हैं। यह मामला तब और भी गंभीर हो जाता है जब यह पता चलता है कि महिला की मौत किसी बीमारी से नहीं, बल्कि गलत पहचान के कारण हुई गलत सर्जरी के बाद उपजी जटिलताओं से हुई है।

कैसे हुई इतनी बड़ी चूक? 

जानकारी के अनुसार, अस्पताल में मरीजों की पहचान सुनिश्चित करने की मानक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। घटनाक्रम कुछ इस प्रकार रहा:

1. नाम का भ्रम: बताया जा रहा है कि पीड़ित महिला और एक अन्य मरीज के नाम या बेड नंबर में समानता के कारण भ्रम की स्थिति पैदा हुई।

2. बिना क्रॉस-चेक के सर्जरी: ऑपरेशन थिएटर (OT) में ले जाने से पहले न तो मरीज के अटेंडेंट से पुष्टि की गई और ना ही उनके रिस्ट-बैंड या फाइलों की गहन जांच हुई।

3. गलत विभाग की सर्जरी: महिला जिस समस्या के लिए भर्ती हुई थी, उसके बजाय किसी दूसरे विभाग की सर्जरी उन पर कर दी गई। 71 वर्ष की आयु में शरीर पहले ही संवेदनशील होता है, ऐसे में गलत एनेस्थीसिया और अनावश्यक सर्जरी ने उनके अंगों पर बुरा प्रभाव डाला, जिससे उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

सुरक्षा प्रोटोकॉल और प्रबंधन पर सवाल

एक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में 'मरीज की सुरक्षा' के बुनियादी नियमों का उल्लंघन होना निम्नलिखित विफलताओं को दर्शाता है:

• चेकलिस्ट का अभाव: WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की 'सर्जिकल सुरक्षा चेकलिस्ट' के अनुसार, सर्जरी से पहले तीन चरणों (Sign In, Time Out, Sign Out) में मरीज की पहचान और सर्जरी के स्थान की पुष्टि अनिवार्य है। यहाँ इस प्रक्रिया का पूरी तरह अभाव दिखा।

• प्रबंधन की ढिलाई: ट्रॉमा सेंटर में अक्सर मरीजों का भारी दबाव होता है, लेकिन यह दबाव किसी की जान लेने का बहाना नहीं बन सकता।

• नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ की चूक: ओटी में ले जाने से पहले वार्ड स्टाफ और ओटी स्टाफ के बीच 'हैंडओवर' प्रक्रिया में बड़ी खामी रही।

निष्कर्ष: एक संस्थागत विफलता

चिकित्सा के क्षेत्र में "Primum non nocere" (सबसे पहले, कोई नुकसान न पहुँचाएं) का सिद्धांत सर्वोपरि है। जब एक डॉक्टर या अस्पताल मरीज की पहचान तक सुनिश्चित नहीं कर पाता, तो वह इलाज करने के नैतिक अधिकार खो देता है। 71 वर्षीय महिला की यह मौत केवल एक लापरवाही नहीं, बल्कि अस्पताल प्रबंधन की उस गहरी नींद का परिणाम है जहाँ कागजों पर तो प्रोटोकॉल हैं, लेकिन धरातल पर वे गायब हैं।

यह घटना देश के सभी अस्पतालों के लिए एक कड़ा सबक है कि तकनीक और विशेषज्ञता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, यदि बुनियादी 'मानव पहचान' की प्रक्रिया में चूक हुई, तो परिणाम विनाशकारी होंगे।

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