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'रीजनल प्लान 2041' के तहत दिल्ली-एनसीआर की सीमाओं का पुनर्निर्धारण: हरियाणा के 5 जिलों को बाहर करने के

11-06-2026

 एनसीआर के भौगोलिक ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के योजनाबद्ध विकास और इसकी सीमाओं को व्यावहारिक बनाने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी नीतिगत निर्णय लिया जा रहा है। 16 जून को आयोजित होने वाली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड (NCRPB) की उच्च स्तरीय बैठक में 'रीजनल प्लान 2041' के प्रारूप को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। इस बैठक का सबसे प्रमुख और संवेदनशील एजेंडा दिल्ली-एनसीआर की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण करना है।

इस नए प्रस्ताव के तहत हरियाणा राज्य के पांच प्रमुख जिलों—करनाल, जींद, महेंद्रगढ़, भिवानी और चरखी दादरी—का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली-एनसीआर के भौगोलिक दायरे से बाहर हो सकता है। यह कदम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बेतरतीब विस्तार को रोकने और वास्तविक रूप से प्रभावित क्षेत्रों पर विकास का ध्यान केंद्रित करने की रणनीति का हिस्सा है।

योजना की पृष्ठभूमि और पूर्व मुख्यमंत्री की पहल

एनसीआर की सीमा को छोटा और अधिक प्रभावी बनाने की यह कवायद नई नहीं है। इस नीतिगत बदलाव की शुरुआत हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल के कार्यकाल के दौरान की गई थी। हरियाणा सरकार का तर्क रहा है कि दिल्ली से 100 से 150 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर स्थित जिलों को एनसीआर में शामिल रखने से व्यावहारिक रूप से कोई बड़ा लाभ नहीं हो रहा था, बल्कि इसके विपरीत स्थानीय विकास और प्रशासनिक स्तर पर कई तरह की जटिलताएं पैदा हो रही थीं।

प्रस्तावित बदलाव का पैमाना: यदि 16 जून की बैठक में इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लग जाती है और इसे पूरी तरह लागू किया जाता है, तो वर्तमान एनसीआर के तहत आने वाला हरियाणा का एक बड़ा क्षेत्र कम हो जाएगा। इसके बाद हरियाणा के अंतर्गत आने वाला यह विशिष्ट अधिसूचित क्षेत्र घटकर करीब 10.5 हजार वर्ग किलोमीटर ही रह जाएगा।

सीमाओं के पुनर्निर्धारण की आवश्यकता क्यों पड़ी?

दिल्ली-एनसीआर के वर्तमान स्वरूप में हरियाणा के 14 जिले शामिल हैं, जो पूरे एनसीआर के कुल क्षेत्रफल का लगभग 57% हिस्सा कवर करते हैं। इतने बड़े क्षेत्र को एनसीआर के कड़े नियमों के तहत प्रबंधित करने में व्यावहारिक चुनौतियां आ रही थीं:

• अत्यधिक दूरी और विकास में असंतुलन: भिवानी, महेंद्रगढ़ और जींद जैसे जिले दिल्ली के मुख्य केंद्र से काफी दूर हैं। एनसीआर के तहत जो बुनियादी ढांचा दिल्ली के नजदीकी शहरों (जैसे गुरुग्राम या फरीदाबाद) को मिलता है, वह इन दूर-दराज के जिलों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा था।

• सख्त नियमों से आम जनता को परेशानी: एनसीआर क्षेत्र में शामिल होने के कारण इन जिलों में निर्माण कार्यों, उद्योगों की स्थापना, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के नियमों और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े बेहद कड़े कानून लागू होते हैं। उदाहरण के लिए, निर्माण गतिविधियों पर रोक या पुराने वाहनों पर प्रतिबंध। दिल्ली से इतनी दूर होने के बावजूद इन नियमों के लागू होने से स्थानीय किसानों, व्यापारियों और आम नागरिकों को असुविधा हो रही थी।

जिलों के बाहर होने से क्या बदलेगा?

यदि करनाल, जींद, महेंद्रगढ़, भिवानी और चरखी दादरी के अधिकांश हिस्से एनसीआर से बाहर होते हैं, तो इसके दोहरे प्रभाव देखने को मिलेंगे:

• स्थानीय उद्योगों और रियल एस्टेट को राहत: इन जिलों में स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों और उद्योगों को शुरू करने के लिए एनसीआर स्तर की कड़क अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्रक्रियाओं से मुक्ति मिलेगी। निर्माण कार्यों पर सर्दियों में लगने वाले स्वतः प्रतिबंधों से राहत मिल सकती है।

• बजटीय आवंटन में बदलाव: एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के फंड से इन जिलों में बड़े बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विकास के लिए मिलने वाली विशेष वित्तीय सहायता या लोन की व्यवस्था में बदलाव आ सकता है। अब इन क्षेत्रों के विकास की पूरी जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य सरकार के बजटीय आवंटन पर निर्भर करेगी।

निष्कर्ष

16 जून की यह बैठक दिल्ली-एनसीआर के भविष्य के नक्शे और शहरी नियोजन के इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट साबित होने जा रही है। 'रीजनल प्लान 2041' के तहत सीमाओं को तर्कसंगत बनाने का यह प्रस्ताव यह स्पष्ट करता है कि अब ध्यान केवल क्षेत्र के आकार को बढ़ाने पर नहीं, बल्कि दिल्ली और उसके आसपास के सघन शहरी क्षेत्रों को अधिक रहने योग्य, स्मार्ट और जाम-मुक्त बनाने पर केंद्रित है। पांच जिलों के एनसीआर से बाहर होने के बाद हरियाणा सरकार इन क्षेत्रों के स्वतंत्र और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकास के लिए नई नीतियां तैयार कर सकेगी।

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