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9 घंटे का वो खौफनाक मंजर, जब थम गई थीं सबकी सांसें और आखिरकार जीत गई जिंदगी

16-05-2026

पंजाब के चक समाना गांव में बोरवेल हादसा: 9 घंटे का वो खौफनाक मंजर, जब थम गई थीं सबकी सांसें और आखिरकार जीत गई जिंदगी

कहा जाता है कि 'जाको राखे साइयां, मार सके न कोय'। यह कहावत पंजाब के चक समाना गांव में उस समय सौ फीसदी सच साबित हुई, जब एक 4 वर्षीय मासूम मौत के अंधेरे कुएं (बोरवेल) को मात देकर सुरक्षित बाहर निकल आया। यह कहानी केवल एक हादसे की नहीं है, बल्कि यह कहानी है मानवीय जज्बे की, प्रशासन की मुस्तैदी की, माता-पिता के अटूट विश्वास की और उस 9 घंटे लंबे चले महा-अभियान (रेस्क्यू ऑपरेशन) की, जिसने आखिरकार एक मासूम को जिंदगी की नई सुबह दिखाई।

कैसे शुरू हुआ हादसों का वो खौफनाक सिलसिला?

पंजाब का चक समाना गांव आम दिनों की तरह अपनी सामान्य रफ्तार से चल रहा था। खेतों में काम चल रहा था, घरों में चहल-पहल थी। इसी गांव के रहने वाले हरिंदर और उनकी पत्नी आशा का 4 वर्षीय मासूम बेटा घर के पास ही खेल रहा था। खेलते-खेलते वह अचानक उस जगह की तरफ चला गया जहां एक खुला हुआ खतरनाक बोरवेल था।

बच्चे की मासूमियत और उसकी चंचल उम्र इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि चंद कदमों की दूरी पर मौत का एक गहरा गड्ढा उसका इंतजार कर रहा है। अचानक पैर फिसलने या पैर अनियंत्रित होने के कारण वह मासूम उस संकरे और गहरे बोरवेल में समा गया। बच्चे की चीख और उसके गायब होने की भनक लगते ही माता-पिता के पैरों तले जमीन खिसक गई। जब उन्होंने बोरवेल के पास जाकर देखा, तो उनके होश उड़ गए—उनका लाडला अंदर गिर चुका था और नीचे से उसकी रोने की सिसकियां आ रही थीं।

इलाके में मचा हड़कंप, जुटने लगी भीड़

जैसे ही यह खबर गांव में फैली, पूरे चक समाना गांव में हड़कंप मच गया। देखते ही देखते बोरवेल के आसपास सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई। हर कोई सहमा हुआ था, मां आशा का रो-रोकर बुरा हाल था और पिता हरिंदर बदहवास से कभी बोरवेल को देखते तो कभी भगवान से प्रार्थना करते। गांव के प्रबुद्ध नागरिकों ने बिना एक पल गंवाए तुरंत स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन को इस हादसे की सूचना दी।

प्रशासन भी स्थिति की गंभीरता को समझ रहा था। बोरवेल की घटनाएं अक्सर जानलेवा साबित होती हैं, इसलिए समय की एक-एक सेकंड कीमती थी। सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन, पुलिस बल और आपातकालीन सेवाएं तुरंत हरकत में आ गईं।

NDRF और SDRF की एंट्री: शुरू हुआ 'मिशन जिंदगी'

हादसे की भयावहता को देखते हुए तुरंत राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) को तैनात किया गया। कुछ ही समय में विशेषज्ञ टीमों ने अत्याधुनिक उपकरणों के साथ घटनास्थल पर मोर्चा संभाल लिया।

9 घंटे लंबे चले इस संयुक्त रेस्क्यू ऑपरेशन को बेहद योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया:

• ऑक्सीजन की तत्काल सप्लाई: बोरवेल के अंदर सबसे बड़ा खतरा दम घुटने का होता है। रेस्क्यू टीम ने सबसे पहले एक पाइप के जरिए बोरवेल के भीतर ऑक्सीजन पहुंचाना शुरू किया ताकि बच्चे को सांस लेने में कोई तकलीफ न हो।

• समानांतर गड्ढे की खुदाई: बच्चे को सीधे ऊपर खींचना बेहद खतरनाक हो सकता था क्योंकि मिट्टी धंसने का डर था। इसलिए, बोरवेल से कुछ दूरी पर जेसीबी (JCB) मशीनों और पोकलेन मशीनों की मदद से एक समानांतर गड्ढा खोदना शुरू किया गया।

• सुरंग का निर्माण: तय गहराई तक पहुंचने के बाद, NDRF और SDRF के जवानों ने हाथों से और छोटे उपकरणों की मदद से उस समानांतर गड्ढे से लेकर बोरवेल तक एक क्षैतिज सुरंग बनाई।

बचाव कार्य की सबसे बड़ी चुनौती: खुदाई के दौरान सबसे बड़ा डर यह था कि कहीं भारी मशीनों के कंपन से बोरवेल के अंदर की मिट्टी न धंस जाए। अगर ऐसा होता, तो बच्चा मिट्टी के नीचे दब सकता था। इसलिए बचाव दल को बेहद सतर्कता और बेहद धीमी लेकिन निरंतर गति से काम करना पड़ा।

9 घंटे का वो पल-पल भारी पड़ता सफर

जैसे-जैसे सूरज ढल रहा था, गांव के लोगों और रेस्क्यू टीम की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। रात के अंधेरे में रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना और भी चुनौतीपूर्ण था। मौके पर बड़ी-बड़ी फ्लड लाइट्स लगाई गईं। डॉक्टर और एम्बुलेंस की टीम को री-इन्फोर्समेंट के साथ वहीं तैनात रखा गया ताकि बच्चे के बाहर निकलते ही उसे तुरंत मेडिकल सपोर्ट दिया जा सके।

बोरवेल के बाहर जहां मशीनें गरज रही थीं, वहीं दूसरी तरफ पूरा गांव और देश भर के लोग जो इस खबर पर नजर रखे हुए थे, भगवान से दुआएं मांग रहे थे। मां आशा का कलेजा फटा जा रहा था, लेकिन डॉक्टरों और स्थानीय लोगों ने उन्हें ढांढस बंधाया।

जब आखिरकार जीत गई जिंदगी

समय बीतता गया और करीब 9 घंटे की कड़ी मशक्कत, पसीने और अटूट हौसले के बाद वह ऐतिहासिक पल आया जिसका सबको इंतजार था। NDRF के एक जांबाज जवान ने सुरंग के रास्ते बोरवेल के भीतर पहुंचकर हरिंदर और आशा के कलेजे के टुकड़े को अपनी सुरक्षित गोद में उठा लिया।

जैसे ही जवान बच्चे को लेकर सुरंग से बाहर निकला, पूरा इलाका 'भारत माता की जय' और 'प्रशासन जिंदाबाद' के नारों से गूंज उठा। 9 घंटे से सिसक रहे माता-पिता की आंखों से आंसू तो बह रहे थे, लेकिन इस बार वो आंसू गम के नहीं, बल्कि बेइंतहा खुशी और सुकून के थे।

बचाव दल ने बिना देर किए बच्चे को डॉक्टरों की टीम के हवाले किया। शुरुआती जांच में बच्चा सुरक्षित और स्थिर पाया गया, जिसके बाद उसे आगे की निगरानी के लिए अस्पताल भेजा गया।

हरिंदर और आशा के बेटे ने अपनी बहादुरी और रेस्क्यू टीम की जांबाजी से आज मौत को मात दे दी है। पूरा देश इस सुरक्षित रेस्क्यू पर राहत की सांस ले रहा है और संयुक्त टीम की इस कामयाबी को सलाम कर रहा है। उम्मीद है कि यह घटना भविष्य के लिए एक सबक बनेगी ताकि फिर कभी किसी मासूम को मौत के इस अंधेरे कुएं में न उतरना पड़े।

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