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सुप्रीम कोर्ट का SC-ST एक्ट पर फैसला

12-05-2026

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18 की व्याख्या के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि न्याय का सिद्धांत केवल कानून के प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि तथ्यों की बारीकी से जांच करना भी अनिवार्य है।

इस फैसले के प्रमुख कानूनी पहलू निम्नलिखित हैं:

• धारा 18 बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता: आमतौर पर SC-ST एक्ट की धारा 18 और 18A अग्रिम जमानत रोक लगाती हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है, तो आरोपी को अग्रिम जमानत दी जा सकती है।

• यांत्रिक अनुप्रयोग पर रोक: अदालत ने कहा कि पुलिस या निचली अदालतों को बिना सोचे-समझे धारा 18 लागू नहीं करनी चाहिए। एफआईआर में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की गंभीरता की जांच करना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

• गुजरात मामले का संदर्भ: यह फैसला गुजरात के एक मामले की सुनवाई के दौरान आया, जहाँ अदालत ने माना कि केवल एक्ट की धाराओं का उल्लेख होने मात्र से किसी व्यक्ति के मौलिक कानूनी अधिकारों को छीना नहीं जा सकता। यदि शिकायत दुर्भावनापूर्ण लगती है, तो अदालत को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।

• संतुलन का सिद्धांत: शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि एक तरफ जहाँ दलितों और पिछड़ों के अधिकारों की रक्षा करना कानून का उद्देश्य है, वहीं दूसरी ओर निर्दोषों को झूठे मामलों में फंसने से बचाना और संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) की रक्षा करना भी अदालत की जिम्मेदारी है।

अदालत का संदेश:

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि कानून का उपयोग ढाल के रूप में होना चाहिए, हथियार के रूप में नहीं। यदि एफआईआर पढ़ने से यह प्रतीत होता है कि अपराध इस एक्ट के दायरे में नहीं आता, तो आरोपी को राहत मिलना उसका कानूनी अधिकार है।

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