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तीन सीनियर IPS अधिकारियों को जांच में लापरवाही बरतने के आरोप में सस्पेंड

16-05-2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हुए जघन्य डॉक्टर हत्याकांड के मामले में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने एक बेहद कड़ा और अभूतपूर्व कदम उठाया है। मामले की जांच में शुरुआती लापरवाही बरतने, सबूतों से छेड़छाड़ की आशंकाओं को न रोक पाने और स्थिति को ठीक से न संभाल पाने के गंभीर आरोपों के तहत तीन सीनियर आईपीएस (IPS) अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (निलंबित) कर दिया गया है।

इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल और दंडात्मक कार्रवाई की घोषणा खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान की। जिन तीन शीर्ष अधिकारियों पर सरकार की यह गाज गिरी है, उनमें कोलकाता के पूर्व पुलिस कमिश्नर (CP) विनीत गोयल का नाम सबसे प्रमुख है। उनके साथ ही दो अन्य वरिष्ठ अधिकारी—डिप्टी कमिश्नर इंदिरा मुखर्जी और डिप्टी कमिश्नर (DC) अभिषेक गुप्ता को भी सस्पेंड कर दिया गया है।

सरकार के इस कदम को कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने और पीड़ित परिवार व जनता के बीच प्रशासन की खोई हुई साख को वापस बहाल करने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।

किन अधिकारियों पर गिरा गाज और क्या हैं आरोप?

शुभेंदु सरकार द्वारा की गई इस कार्रवाई के केंद्र में पुलिस महकमे के वो चेहरे हैं, जो घटना के समय और उसके ठीक बाद कोलकाता पुलिस के सबसे महत्वपूर्ण पदों पर तैनात थे।

1. विनीत गोयल (पूर्व कमिश्नर ऑफ पुलिस, कोलकाता):

आरजी कर कांड के समय विनीत गोयल ही कोलकाता पुलिस के मुखिया थे। उन पर आरोप है कि घटना के बाद शुरुआती 48 घंटों में पुलिस ने जिस तरह से मामले को संभाला, वह बेहद निराशाजनक था। डॉक्टरों, प्रदर्शनकारियों और पीड़ित परिवार का आरोप था कि पुलिस ने शुरुआत में इसे हत्या के बजाय आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की थी। इसके अलावा, अस्पताल के भीतर भीड़ द्वारा की गई तोड़फोड़ को रोकने में भी पुलिस विफल रही थी, जिसके लिए सीधे तौर पर पुलिस कमिश्नर की लीडरशिप को जिम्मेदार माना गया।

2. इंदिरा मुखर्जी (डिप्टी कमिश्नर):

डीसी इंदिरा मुखर्जी पर जांच के दौरान महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं की अनदेखी करने और प्रशासनिक लापरवाही बरतने का आरोप है। प्रदर्शनकारी जूनियर डॉक्टरों और कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाए थे कि घटना स्थल की सुरक्षा को लेकर जो मुस्तैदी दिखाई जानी चाहिए थी, उसमें भारी चूक हुई।

3. अभिषेक गुप्ता (डिप्टी कमिश्नर):

अभिषेक गुप्ता पर भी कर्तव्य में लापरवाही और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहने के गंभीर आरोप हैं। विशेष रूप से जब अस्पताल परिसर में आधी रात को असामाजिक तत्वों ने हमला किया और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया, तब मौके पर सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी इन्हीं अधिकारियों के कंधों पर थी।

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की दोटूक घोषणा

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस बड़ी कार्रवाई की घोषणा करते हुए साफ कर दिया कि उनकी सरकार अपराधियों और उनका साथ देने वाले या लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाएगी।

सीएम शुभेंदु का बयान:

"आरजी कर अस्पताल में हमारी बेटी के साथ जो हुआ, उसने पूरे देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। इस मामले में न्याय होना ही चाहिए, और न्याय की राह में रोड़ा बनने वाले या अपनी जिम्मेदारी से भागने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा—चाहे वह कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो। विनीत गोयल, इंदिरा मुखर्जी और अभिषेक गुप्ता को जांच में लापरवाही बरतने के आरोप में सस्पेंड किया जा रहा है। हमारी सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग कर रही है और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि दोषियों को फांसी की सजा मिले।"

आरजी कर कांड: जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया

यह पूरा मामला कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज का है, जहां एक जूनियर महिला डॉक्टर की ड्यूटी के दौरान क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे देश के चिकित्सा समुदाय और आम नागरिकों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया था।

पुलिस की भूमिका पर क्यों उठे थे सवाल?

• शुरुआती ढुलमुल रवैया: पीड़ित परिवार का आरोप था कि उन्हें कई घंटों तक शव नहीं देखने दिया गया और मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की गई।

• क्राइम सीन से छेड़छाड़ की आशंका: जिस सेमिनार हॉल में यह वारदात हुई, उसके ठीक बगल में रेनोवेशन (मरम्मत) का काम शुरू करवा दिया गया, जिससे सबूत मिटाने के आरोप लगे।

• भीड़ का हमला: जब देश भर में विरोध प्रदर्शन चल रहा था, तब आधी रात को हजारों अज्ञात लोगों की भीड़ ने आरजी कर अस्पताल पर हमला कर दिया और वहां जमकर तोड़फोड़ की। कोलकाता पुलिस इस भीड़ को नियंत्रित करने में पूरी तरह नाकाम रही थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

प्रशासनिक और राजनीतिक निहितार्थ

शुभेंदु सरकार का यह एक्शन केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने भी हैं। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा है।

• जनता के गुस्से को शांत करने का प्रयास: इस घटना को लेकर डॉक्टरों और आम जनता में जो गुस्सा था, उसे शांत करने के लिए सरकार को किसी बड़ी और सख्त कार्रवाई की जरूरत थी। शीर्ष आईपीएस अधिकारियों का निलंबन यह संदेश देता है कि सरकार अब किसी को भी संरक्षण नहीं देगी।

• विपक्ष पर पलटवार: पूर्ववर्ती सरकार के समय पुलिस पर जो 'राजनीतिकरण' के आरोप लगते थे, इस कार्रवाई के जरिए मौजूदा सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि अब पुलिस को अपने काम के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा।

• केंद्रीय एजेंसियों को सहयोग: चूंकि इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के हाथों में है, ऐसे में राज्य सरकार द्वारा इन अधिकारियों को सस्पेंड करने से सीबीआई को भी अपनी जांच आगे बढ़ाने और इन अधिकारियों से पूछताछ करने में आसानी होगी।

आगे क्या होगा?

निलंबन के बाद अब इन तीनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाएगी। इसके अलावा, यदि सीबीआई की जांच में इनके खिलाफ सबूतों को नष्ट करने या अपराधियों को बचाने की साजिश में शामिल होने के पुख्ता सबूत मिलते हैं, तो इनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं तथा इनके खिलाफ आपराधिक मामले भी दर्ज किए जा सकते हैं।

जूनियर डॉक्टरों के संगठन और प्रदर्शनकारियों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन उनका कहना है कि यह न्याय की दिशा में केवल पहला कदम है। उनकी मांग है कि जब तक इस जघन्य अपराध के मुख्य दोषियों और इसके पीछे की पूरी साजिश का पर्दाफाश नहीं हो जाता और उन्हें सख्त से सख्त सजा नहीं मिल जाती, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

शुभेंदु सरकार के इस कड़े रुख ने यह साफ कर दिया है कि पश्चिम बंगाल के प्रशासनिक ढांचे में अब एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो चुकी है, जहां लापरवाही की कीमत सीधे निलंबन और कानूनी कार्रवाई से चुकानी होगी।

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