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केरल का CM कौन बनेगा?
1. तमिलनाडु: त्रिशंकु विधानसभा का 'चेकमेट'
तमिलनाडु में इस बार के नतीजे किसी भी एक दल या गठबंधन के पक्ष में स्पष्ट नहीं थे। विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु परिणाम आने के बाद सरकार गठन को लेकर लंबी खींचतान चली। कई छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई थी। हालांकि, राजनीतिक जोड़-तोड़ और गठबंधन के सहयोगियों को साधने के बाद आखिरकार नई सरकार ने शपथ ले ली है। तमिलनाडु में सरकार का बनना यह दर्शाता है कि गठबंधन की राजनीति में लचीलापन और सौदेबाजी कितनी अनिवार्य है।
2. केरल का सस्पेंस: जीत के बाद की चुनौती
केरल में स्थिति तमिलनाडु से बिल्कुल उलट है। यहाँ मतदाताओं ने UDF को स्पष्ट और भारी बहुमत देकर सरकार बनाने का जनादेश दिया है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि नतीजों के एक हफ्ते बाद भी कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मुख्यमंत्री के नाम पर आम सहमति नहीं बना पाए हैं।
केरल कांग्रेस के भीतर इस समय 'पावर स्ट्रगल' (सत्ता संघर्ष) अपने चरम पर है। तीन बड़े चेहरे मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे आगे हैं और तीनों का अपना-अपना प्रभाव क्षेत्र है।
3. मुख्यमंत्री की रेस के तीन प्रमुख खिलाड़ी
केरल की राजनीति में इस समय तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, जिनकी अपनी-अपनी ताकत और चुनौतियां हैं:
क. रमेश चेन्नीथला
चेन्नीथला केरल कांग्रेस के सबसे अनुभवी चेहरों में से एक हैं। वे पहले भी नेता प्रतिपक्ष और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। उनके पास संगठन का लंबा अनुभव है और पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। उनका तर्क है कि वरिष्ठता के आधार पर उन्हें मौका मिलना चाहिए।
ख. के.सी. वेणुगोपाल
के.सी. वेणुगोपाल वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महासचिव हैं और राहुल गांधी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते हैं।
• राहुल गांधी का झुकाव: दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राहुल गांधी केरल की कमान वेणुगोपाल को सौंपना चाहते हैं। वेणुगोपाल का राष्ट्रीय कद और गांधी परिवार से नजदीकी उन्हें इस रेस में बहुत शक्तिशाली बनाती है। हालांकि, केरल की स्थानीय राजनीति में उन्हें 'बाहरी' या दिल्ली से थोपा गया नेता बताने का जोखिम भी बना हुआ है।
ग. वी.डी. सतीशन
सतीशन ने पिछले कुछ वर्षों में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। वे युवाओं और मध्यम वर्ग के बीच काफी लोकप्रिय हैं।
• सतीशन का अल्टीमेटम: सतीशन ने इस बार अपना रुख बेहद कड़ा कर लिया है। उन्होंने साफ तौर पर संदेश दे दिया है कि उन्हें "मुख्यमंत्री पद के अलावा कुछ भी मंजूर नहीं है।" उनका मानना है कि सरकार विरोधी लहर को भुनाने और चुनाव में पार्टी को जीत दिलाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है, इसलिए उन्हें उप-मुख्यमंत्री या किसी मंत्रालय से संतुष्ट नहीं किया जा सकता।
4. हाईकमान की दुविधा: किसे चुनें और किसे मनाएं?
केरल में मुख्यमंत्री चुनना कांग्रेस हाईकमान के लिए एक जटिल पहेली बन गया है।
1. गुटबाजी का डर: यदि किसी एक नाम पर मुहर लगती है, तो बाकी दो गुटों के नाराज होने का खतरा है। केरल में कांग्रेस के भीतर 'A' और 'I' ग्रुप की पुरानी गुटबाजी रही है, जिसे खत्म करना नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
2. सहयोगियों का दबाव: UDF गठबंधन में मुस्लिम लीग जैसे घटक दल भी शामिल हैं। वे ऐसी सरकार चाहते हैं जो पांच साल तक स्थिर रहे। मुख्यमंत्री पद का फैसला टलने से सहयोगियों के बीच भी बेचैनी बढ़ रही है।
3. वेणुगोपाल बनाम स्थानीय नेतृत्व: राहुल गांधी अगर वेणुगोपाल को सीएम बनाते हैं, तो स्थानीय नेताओं (सतीशन और चेन्नीथला) का विद्रोह पार्टी को कमजोर कर सकता है। वहीं, अगर वेणुगोपाल को नहीं बनाया जाता, तो दिल्ली में राहुल गांधी के रणनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
5. देरी का प्रशासन और जनता पर प्रभाव
नतीजों के एक हफ्ते बाद भी सरकार का स्वरूप तय न होने से प्रशासनिक कामकाज पर असर पड़ रहा है।
• बजट और नीतियां: नई सरकार को जल्द ही राज्य के वित्तीय हालात और विकास की रूपरेखा तय करनी है।
• जनता का संदेश: स्पष्ट बहुमत के बावजूद देरी होने से जनता के बीच यह संदेश जाता है कि पार्टी सेवा से ज्यादा पद के लिए संघर्ष कर रही है।
6. आगे की राह: क्या हो सकता है समाधान?
कांग्रेस नेतृत्व इस समय 'बीच का रास्ता' निकालने की कोशिश कर रहा है। संभावना है कि:
• ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला: पार्टी दो नेताओं के बीच कार्यकाल को बांटने का सुझाव दे सकती है, जैसा कि छत्तीसगढ़ या राजस्थान में चर्चा में रहा था (हालांकि यह अक्सर सफल नहीं होता)।
• उप-मुख्यमंत्री पद: सतीशन या चेन्नीथला को महत्वपूर्ण विभागों के साथ डिप्टी सीएम पद का प्रस्ताव दिया जा सकता है, लेकिन सतीशन का हालिया बयान इसे मुश्किल बना रहा है।
निष्कर्ष
केरल का यह राजनीतिक सस्पेंस इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में चुनाव जीतना जितना कठिन है, सरकार चलाना और आंतरिक लोकतंत्र को संभालना उससे भी बड़ी चुनौती है। जहाँ तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा के बावजूद सरकार बन गई, वहीं केरल में बहुमत के बोझ तले कांग्रेस दबती नजर आ रही है। अगले 24 से 48 घंटे केरल की राजनीति के लिए निर्णायक होंगे। क्या राहुल गांधी अपने पसंदीदा उम्मीदवार को कुर्सी दिला पाएंगे, या स्थानीय नेताओं की जिद हाईकमान को झुकने पर मजबूर कर देगी?
