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रक्त रंजित बैसाखी: जलियांवाला बाग हत्याकांड की 107वीं बरसी, जब ब्रिटिश क्रूरता ने मानवता को किया था
रक्त रंजित बैसाखी: जलियांवाला बाग हत्याकांड की 107वीं बरसी, जब ब्रिटिश क्रूरता ने मानवता को किया था शर्मसार
अमृतसर: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 13 अप्रैल का दिन एक अमिट जख्म की तरह दर्ज है। आज से ठीक 107 साल पहले, 1919 में बैसाखी के पावन पर्व पर अमृतसर का जलियांवाला बाग निर्दोष भारतीयों के खून से लाल हो गया था। यह केवल एक हत्याकांड नहीं था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत की वह वहशी क्रूरता थी जिसने दुनिया को बता दिया था कि 'सभ्यता' का ढोंग करने वाले अंग्रेज असल में कितने संवेदनहीन और दमनकारी थे। आज देश उन शहीदों को नमन कर रहा है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए हंसते-हंसते गोलियां खाई थीं।
10 मिनट, 1650 राउंड और मौत का तांडव
13 अप्रैल 1919 की शाम, जलियांवाला बाग में हजारों लोग शांतिपूर्ण तरीके से डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में जमा हुए थे। इस भीड़ में न केवल प्रदर्शनकारी थे, बल्कि बैसाखी के मेले में आए मासूम बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल थे। बाग चारों ओर से ऊंची दीवारों से घिरा था और बाहर निकलने का केवल एक संकरा रास्ता था।
तभी जनरल रेजिनल्ड डायर अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचा। बिना किसी चेतावनी के, उसने अपने सैनिकों को निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। अगले 10 मिनट तक मौत का नंगा नाच चलता रहा। सैनिकों ने तब तक गोलियां बरसाईं जब तक उनका गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया। कुल 1650 राउंड गोलियां चलीं, जिसने शांत बाग को बूचड़खाने में तब्दील कर दिया।
सरकारी आंकड़े बनाम कड़वी सच्चाई
ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 379 और घायलों की संख्या 1000 के करीब बताई थी। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक भयावह थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इस नरसंहार में 1000 से अधिक लोग शहीद हुए थे और 1500 से ज्यादा घायल हुए थे।
• खूनी कुआं: गोलियों से बचने के लिए सैकड़ों लोगों ने बाग में स्थित एक पुराने कुएं में छलांग लगा दी। बाद में उस कुएं से 120 से अधिक शव बरामद किए गए थे।
• कोई निकास नहीं: संकरे रास्ते पर डायर ने अपनी मशीनगनें तैनात कर दी थीं, जिससे चाहकर भी कोई मासूम बाहर नहीं निकल सका।
क्रूरता की हद: जनरल डायर की निर्लज्जता
इस हत्याकांड के बाद जब हंटर आयोग ने जनरल डायर से पूछताछ की, तो उसने जरा भी पश्चाताप नहीं दिखाया। उसने गर्व से कहा कि उसका उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि भारतीयों के मन में एक 'नैतिक प्रभाव' पैदा करना और उन्हें डराना था। उसने यहां तक कहा कि यदि रास्ता चौड़ा होता, तो वह वहां बख्तरबंद गाड़ियां ले जाता और मरने वालों की संख्या और भी अधिक होती।
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स्वतंत्रता आंदोलन का टर्निंग पॉइंट
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया:
1. रवींद्रनाथ टैगोर का त्याग: इस नरसंहार के विरोध में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई 'नाइटहुड' (सर) की उपाधि लौटा दी थी।
2. गांधी जी का मोहभंग: इस घटना ने महात्मा गांधी को पूरी तरह झकझोर दिया, जिसके बाद उन्होंने ब्रिटिश न्याय प्रणाली से विश्वास खो दिया और 1920 में 'असहयोग आंदोलन' की शुरुआत की।
3. क्रांतिकारियों का उदय: ऊधम सिंह जैसे युवा क्रांतिकारियों के मन में इस घटना ने प्रतिशोध की ज्वाला भर दी। शहीद ऊधम सिंह ने 21 साल बाद लंदन जाकर इस नरसंहार के समय पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ'डायर को गोली मारकर शहीद देशवासियों का बदला लिया।
आज भी जिंदा हैं खौफ के निशान
आज 107 साल बाद भी जलियांवाला बाग की दीवारों पर गोलियों के निशान मौजूद हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाते हैं कि यह आजादी हमें कितनी भारी कीमत चुकाकर मिली है। वह कुआं आज भी उन चीखों की गवाही देता है जो ब्रिटिश संगीनों के डर से उसमें समा गई थीं।
निष्कर्ष
जलियांवाला बाग का नरसंहार ब्रिटिश राज के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। इसने सोए हुए भारत को जगा दिया और ब्रिटिश साम्राज्य के अंत की पटकथा लिख दी। आज जब हम इस हत्याकांड की 107वीं बरसी मना रहे हैं, तो यह हमारा कर्तव्य है कि हम उन गुमनाम शहीदों के बलिदान को याद रखें और उस अखंड भारत की रक्षा का संकल्प लें, जिसका सपना उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक देखा था।
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा।
