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ईरान संकट और भारत की विदेश नीति: ओवैसी के आरोपों का विस्तृत विश्लेषण
पश्चिम एशिया में गहराता संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय युद्ध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया है। एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का हालिया बयान इसी जटिल स्थिति की ओर इशारा करता है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और इजरायल-अमेरिका के साथ उनके संबंधों पर तीखे सवाल उठाए हैं।
1. ओवैसी का मुख्य तर्क: एक बड़े क्षेत्रीय विनाश की आशंका
ओवैसी का सबसे बड़ा आरोप यह है कि डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) और बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) का साझा लक्ष्य ईरान को पूरी तरह से अस्थिर करना है। उनका तर्क है कि जिस तरह गाजा (Gaza) को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया, वैसा ही हश्र ईरान का करने की योजना बनाई जा रही है।
ओवैसी ने एक 'डोमिनो इफेक्ट' की चेतावनी दी है। उनके अनुसार, ईरान के बाद अगला निशाना तुर्की और अन्य अरब देश हो सकते हैं। यह बयान इस डर को दर्शाता है कि पश्चिम एशिया की मौजूदा अस्थिरता एक 'संपूर्ण क्षेत्रीय युद्ध' (Total Regional War) में बदल सकती है, जिससे मुस्लिम जगत के प्रभाव वाले देशों की संप्रभुता को खतरा पैदा हो जाएगा।
2. 'मोदी को पता था': इंटेलिजेंस और डिप्लोमेसी पर सवाल
बयान का सबसे विवादास्पद हिस्सा वह है जहाँ ओवैसी कहते हैं कि "मोदी को पता था कि ईरान पर हमला होने वाला है।" यहाँ ओवैसी दो मुख्य बिंदुओं पर प्रहार कर रहे हैं:
* पूर्वानुमान और प्राथमिकता: यदि भारत सरकार को हमले की जानकारी थी, तो इजरायल की यात्रा करना या उनके साथ रणनीतिक साझेदारी को प्रगाढ़ करना एक 'पक्षपाती' कदम माना जाएगा। ओवैसी का मानना है कि भारत को एक तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए थी, न कि किसी एक गुट का हिस्सा दिखना चाहिए था।
* रणनीतिक चूक: ओवैसी का आरोप है कि प्रधानमंत्री ने ट्रंप और नेतन्याहू के साथ व्यक्तिगत दोस्ती को देश के दीर्घकालिक हितों से ऊपर रखा। उनके अनुसार, भारत की पारंपरिक विदेश नीति हमेशा 'संतुलन' (Balancing Act) की रही है, लेकिन वर्तमान सरकार ने इसे 'एकतरफा' बना दिया है।
3. घरेलू असर: LPG संकट और ऊर्जा सुरक्षा
ओवैसी ने इस अंतरराष्ट्रीय संघर्ष को सीधे आम भारतीय की रसोई से जोड़ा है। वर्तमान में भारत जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनमें एलपीजी (LPG) की कमी सबसे प्रमुख है।
* आपूर्ति श्रृंखला में बाधा: ईरान और इजरायल के बीच तनाव के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आयात करता है।
* आर्थिक बोझ: जब युद्ध जैसे हालात होते हैं, तो कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। ओवैसी का तर्क है कि अगर भारत ने सभी पक्षों के साथ समान रूप से दोस्ताना संबंध रखे होते, तो शायद आज देश को ईंधन की इस किल्लत और महंगाई का सामना नहीं करना पड़ता।
4. भारत की विदेश नीति की ऐतिहासिक निरंतरता बनाम वर्तमान बदलाव
दशकों से भारत की विदेश नीति 'गुटनिरपेक्षता' (Non-Alignment) पर आधारित रही है। हमने फिलिस्तीन का समर्थन भी किया और इजरायल के साथ संबंध भी सुधारे। हमने ईरान से तेल खरीदा और अमेरिका के साथ परमाणु समझौता भी किया।
ओवैसी का दावा है कि मोदी सरकार के तहत यह संतुलन बिगड़ गया है। वह कहते हैं कि "हमें सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाने चाहिए थे।" उनका इशारा इस ओर है कि इजरायल के करीब जाने से भारत ने ईरान और अन्य खाड़ी देशों के साथ अपने उस 'स्पेशल बॉन्ड' को कमजोर कर लिया है, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए अनिवार्य था।
5. तुर्की और अरब जगत पर खतरे का दावा
ओवैसी ने तुर्की का जिक्र करके इस बहस को एक नई दिशा दी है। तुर्की, जो नाटो (NATO) का सदस्य भी है और मुस्लिम जगत की एक मजबूत आवाज भी, इजरायल की नीतियों का कड़ा आलोचक रहा है। ओवैसी का मानना है कि ईरान के कमजोर होने से इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन (Balance of Power) पूरी तरह इजरायल और अमेरिका के पक्ष में झुक जाएगा, जिससे भविष्य में तुर्की जैसे देशों की स्वायत्तता पर भी आंच आ सकती है।
6. निष्कर्ष: क्या भारत को अपनी नीति पर पुनर्विचार की जरूरत है?
ओवैसी के आरोपों को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसमें भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) का मुद्दा छिपा है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है और ईरान पूरी तरह संकट में आता है, तो भारत के लिए इसके परिणाम केवल एलपीजी की कमी तक सीमित नहीं रहेंगे:
* चाबहार बंदरगाह: ईरान में भारत का बड़ा निवेश खतरे में पड़ सकता है।
* प्रवासी भारतीय: खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा और उनकी कमाई (Remittances) पर बुरा असर पड़ेगा।
* आतंकवाद और अस्थिरता: क्षेत्र में अराजकता बढ़ने से कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल सकता है, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती होगा।
अंततः, ओवैसी का बयान सरकार को यह याद दिलाने की कोशिश है कि अंतरराष्ट्रीय दोस्ती केवल 'नेताओं के बीच के तालमेल' तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका आधार 'राष्ट्रीय हित' और 'जनता की बुनियादी जरूरतें' होनी चाहिए। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत सरकार ईरान-इजरायल संकट के बीच अपनी ऊर्जा जरूरतों को कैसे सुरक्षित रखती है और वैश्विक मंच पर अपनी 'विश्व मित्र' की छवि को कैसे बरकरार रखती है।
