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ईद-उल-अज़हा (बकरीद) 2026: त्याग, समर्पण और अटूट आस्था का महापर्व

08-05-2026

इस्लामी कैलेंडर (हिजरी) के 12वें महीने, 'ज़ुल-हिज्जा' की 10वीं तारीख को मनाया जाने वाला ईद-उल-अज़हा, जिसे आम बोलचाल में बकरीद कहा जाता है, मुस्लिम समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। वर्ष 2026 में, इस त्योहार के 27 या 28 मई को मनाए जाने की प्रबल संभावना है। जैसा कि इस्लामी परंपरा रही है, इसकी सटीक तारीख का निर्धारण पूरी तरह से 'चांद के दीदार' पर निर्भर करता है।

यह त्योहार केवल जश्न का अवसर नहीं है, बल्कि यह हज़रत इब्राहिम (अलैहि.) के महान बलिदान और अल्लाह के प्रति उनकी अटूट निष्ठा की याद दिलाता है। आइए, इस पावन पर्व के विभिन्न पहलुओं, इसके इतिहास और इसके सामाजिक-धार्मिक महत्व पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

1. चांद का दीदार और तारीख का निर्धारण

इस्लामी कैलेंडर पूरी तरह से चंद्र चक्र पर आधारित होता है। यही कारण है कि ग्रेगोरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) के अनुसार इसकी तारीखें हर साल लगभग 10-11 दिन पीछे खिसक जाती हैं।

• चांद की गवाही: ज़ुल-हिज्जा महीने का चांद जिस दिन दिखाई देता है, उसके ठीक 10 दिन बाद बकरीद मनाई जाती है। यदि 18 मई 2026 को चांद दिखता है, तो बकरीद 27 मई को होगी; अन्यथा यह 28 मई को मनाई जाएगी।

• आधिकारिक घोषणा: सऊदी अरब और भारत सहित दुनिया भर की हिलाल समितियां (चांद देखने वाली समितियां) शाम के वक्त चांद की तस्दीक करती हैं, जिसके बाद ही मस्जिदों से आधिकारिक घोषणा की जाती है।

2. बकरीद का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: हज़रत इब्राहिम की कुर्बानी

बकरीद का त्योहार 'बलिदान' का प्रतीक है। इसके पीछे एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक कहानी है, जो हज़रत इब्राहिम और उनके पुत्र हज़रत इस्माइल से जुड़ी है।

इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्रिय चीज़ की कुर्बानी मांगी। हज़रत इब्राहिम के लिए उनके पुत्र हज़रत इस्माइल सबसे प्रिय थे। अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए, उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े की कुर्बानी देने का निर्णय लिया।

जब वह अपने पुत्र की गर्दन पर छुरी चलाने वाले थे, तभी अल्लाह ने उनकी नीयत और वफादारी को देखते हुए हज़रत इस्माइल की जगह एक दुंबा (भेड़ जैसा जानवर) रख दिया। इस प्रकार हज़रत इस्माइल सुरक्षित रहे और यह परंपरा 'कुर्बानी' के रूप में अमर हो गई। यह घटना सिखाती है कि ईश्वर के प्रति समर्पण में किसी भी सांसारिक मोह का स्थान नहीं होना चाहिए।

3. पर्व की रस्में और इबादत का तरीका

बकरीद का दिन सुबह की विशेष नमाज से शुरू होता है और तीन दिनों तक चलने वाली कुर्बानी की रस्म पर समाप्त होता है।

• ईदगाह में नमाज: इस दिन पुरुष नए वस्त्र पहनकर ईदगाह या जामा मस्जिदों में सामूहिक रूप से 'दो रकात' वाजिब नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद खुतबा (धार्मिक प्रवचन) दिया जाता है, जिसमें अमन और भाईचारे की दुआ की जाती है।

• कुर्बानी की रस्म: नमाज के बाद 'क़ुरबानी' की जाती है। इसमें बकरे, भेड़, गाय या ऊंट (स्थानीय कानूनों के अनुसार) की बलि दी जाती है। यह रस्म उन लोगों पर वाजिब (अनिवार्य) है जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं।

• हज का समापन: यह वह समय भी होता है जब दुनिया भर से लाखों मुसलमान मक्का में 'हज' की यात्रा पूरी करते हैं। बकरीद का दिन हज के अनुष्ठानों के समापन का भी प्रतीक है।

4. मांस का वितरण: सामाजिक समरसता का संदेश

कुर्बानी के मांस के वितरण के लिए इस्लाम में एक स्पष्ट और न्यायसंगत नियम बनाया गया है, जो सामाजिक समानता को बढ़ावा देता है। मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है:

1. पहला हिस्सा: अपने परिवार के लिए।

2. दूसरा हिस्सा: रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए।

3. तीसरा हिस्सा: गरीब, जरूरतमंद और मिसकीन लोगों के लिए।

यह विभाजन सुनिश्चित करता है कि समाज का कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी गरीब क्यों न हो, त्योहार की खुशी और पौष्टिक भोजन से वंचित न रहे। यह दान और परोपकार की भावना को जागृत करता है।

5. बकरीद का आध्यात्मिक महत्व

बकरीद केवल मांस बांटने या नए कपड़े पहनने का त्योहार नहीं है। इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ हैं:

• अहंकार की कुर्बानी: जानवर की कुर्बानी वास्तव में मनुष्य के भीतर छिपे क्रोध, लालच, अहंकार और बुराइयों की कुर्बानी का प्रतीक है।

• धैर्य और विश्वास: यह पर्व हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना चाहिए, जैसा हज़रत इब्राहिम ने किया था।

• अनुशासन: ईद की नमाज से लेकर मांस के वितरण तक, यह पर्व एक अनुशासित जीवनशैली का संदेश देता है।

6. आधुनिक परिप्रेक्ष्य और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी

बदलते समय के साथ, बकरीद मनाने के तरीकों में भी जागरूकता आई है। वर्तमान में मुस्लिम समुदाय के उलेमा और बुद्धिजीवी निम्नलिखित बातों पर जोर देते हैं:

• स्वच्छता का ध्यान: कुर्बानी के बाद अवशेषों को सार्वजनिक स्थानों पर न फेंककर उन्हें उचित तरीके से दफनाने या नगर निगम को सौंपने की अपील की जाती है।

• कानून का सम्मान: जिस क्षेत्र में जो जानवर प्रतिबंधित है, उसकी कुर्बानी न देकर कानून और सामाजिक सद्भाव का सम्मान करना इस त्योहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

• फिजूलखर्ची से बचाव: सजावट और दिखावे के बजाय उस पैसे को शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे नेक कार्यों में खर्च करने का चलन भी बढ़ रहा है।

7. निष्कर्ष: एकता और भाईचारे का संदेश

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, बकरीद का त्योहार आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करता है। जब मुस्लिम अपने पड़ोसियों (चाहे वे किसी भी धर्म के हों) को मांस और पकवान भेजते हैं, तो इससे दिलों की दूरियां मिटती हैं।

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