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विप्रो की महिला प्रोजेक्ट मैनेजर ने सीनियर पर लगाया धर्मपरिवर्तन और प्रताड़ना का आरोप, POSH के तहत

05-06-2026

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों में शुमार विप्रो से एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कंपनी की एक पूर्व महिला प्रोजेक्ट मैनेजर ने अपनी ही महिला वरिष्ठ अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि उनकी सीनियर उन पर धर्मपरिवर्तन करने का लगातार दबाव बना रही थीं, उनके खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रही थीं और अंततः उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।

इस हाई-प्रोफाइल मामले के सामने आने के बाद कॉर्पोरेट जगत में एक नई बहस छिड़ गई है। शिकायत मिलने के बाद कंपनी प्रशासन और आंतरिक समितियों ने इस मामले की गहनता से जांच शुरू कर दी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आंतरिक कानूनी और प्रशासनिक टीमें इस बात की समीक्षा कर रही हैं कि यह पूरा मामला POSH अधिनियम के दायरे में आता है या नहीं।

आइए इस पूरे मामले, शिकायतकर्ता के दावों, कंपनी की प्रतिक्रिया और इसमें शामिल कानूनी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।

शिकायतकर्ता के गंभीर आरोप: क्या है पूरा मामला?

रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़ित महिला विप्रो में एक प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्यरत थीं। उन्होंने अपनी महिला रिपोर्टिंग मैनेजर (वरिष्ठ अधिकारी) के खिलाफ आंतरिक शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में लगाए गए आरोप मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर केंद्रित हैं:

1. धर्मपरिवर्तन का अनुचित दबाव

शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनकी महिला वरिष्ठ अधिकारी अपनी आधिकारिक स्थिति का दुरुपयोग कर रही थीं। उन्होंने कार्यस्थल पर शिकायतकर्ता को एक विशिष्ट धर्म को अपनाने और अपनी धार्मिक मान्यताओं को बदलने के लिए बार-बार प्रेरित और मजबूर किया। कॉर्पोरेट संस्कृति में इस तरह के धार्मिक दबाव का मामला बेहद दुर्लभ और गंभीर माना जाता है।

2. आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियां

पीड़िता का दावा है कि जब उन्होंने सीनियर की धार्मिक बातों और दबाव को मानने से इनकार कर दिया, तो उनके साथ कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार शुरू हो गया। उनकी व्यक्तिगत मान्यताओं, जीवनशैली और काम को लेकर टीम के सामने आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियां की गईं, जिससे उनका कार्यस्थल पर टिके रहना मानसिक रूप से प्रताड़ना जैसा हो गया।

3. इस्तीफा देने का दबाव और जॉब एग्जिट

आरोपों के मुताबिक, जब प्रताड़ना की सीमा पार हो गई, तो सीनियर अधिकारी ने उन पर नौकरी छोड़ने का सीधा दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनके प्रदर्शन को जानबूझकर खराब दिखाने की धमकी दी गई। इसी दबाव और मानसिक तनाव के चलते अंततः प्रोजेक्ट मैनेजर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। बाद में कंपनी के मानव संसाधन (HR) विभाग द्वारा इस इस्तीफे को स्वीकार भी कर लिया गया।

कंपनी की कार्रवाई: क्या यह POSH कानून के दायरे में है?

शिकायत दर्ज होने के बाद विप्रो प्रशासन ने इसे बेहद गंभीरता से लिया है। कंपनी की आंतरिक टीमें इस बात का कानूनी मूल्यांकन कर रही हैं कि क्या इस शिकायत को POSH अधिनियम, 2013 के तहत निपटाया जा सकता है।

क्या कहता है कानून?

आम तौर पर, POSH अधिनियम कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि, इस मामले में मुख्य आरोप 'धार्मिक प्रताड़ना और धर्मपरिवर्तन के दबाव' का है। कानूनी विशेषज्ञ इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या वरिष्ठ अधिकारी द्वारा बनाया गया दबाव कार्यस्थल पर एक "प्रतिकूल कार्य वातावरण" बनाने की श्रेणी में आता है। POSH कानून के तहत, यदि कोई वरिष्ठ अधिकारी किसी महिला कर्मचारी को अनुचित रूप से प्रताड़ित करता है जिससे उसका काम करना असंभव हो जाए, तो कुछ परिस्थितियों में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) इसकी जांच कर सकती है।

यदि यह मामला तकनीकी रूप से POSH के दायरे में नहीं भी आता है, तो भी यह कंपनी के 'कोड ऑफ कंडक्ट' और 'समान अवसर नीति' का सीधा उल्लंघन है, जिसके तहत आरोपी अधिकारी के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

कॉर्पोरेट नीतियों और कार्यस्थल संस्कृति पर उठते सवाल

विप्रो जैसी प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) में इस तरह की घटना का सामने आना आईटी सेक्टर की कार्य संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। भारतीय और वैश्विक कॉर्पोरेट नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कार्यस्थल पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष और पेशेवर होना चाहिए।

विप्रो की नीति: विप्रो दुनिया भर में अपनी विविधता, समावेशन और कड़े नैतिक सिद्धांतों के लिए जानी जाती है। कंपनी की नीतियों के अनुसार, किसी भी कर्मचारी के साथ उसके लिंग, जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर भेदभाव या प्रताड़ना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। कंपनी ने आश्वस्त किया है कि इस मामले में निष्पक्ष जांच की जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

इस मामले के संभावित परिणाम:

1. आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट: यदि आंतरिक जांच में सीनियर अधिकारी पर लगे आरोप सही पाए जाते हैं, तो कंपनी उन्हें तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर सकती है।

2. कानूनी कार्रवाई: शिकायतकर्ता के पास इस मामले को श्रम न्यायालय या पुलिस के समक्ष ले जाने का विकल्प भी खुला है, क्योंकि जबरन धर्मपरिवर्तन का दबाव बनाना भारतीय दंड संहिता (अब भारतीय न्याय संहिता) के तहत एक आपराधिक कृत्य है।

3. इस्तीफे की समीक्षा: यदि यह साबित होता है कि इस्तीफा दबाव में लिया गया था, तो कंपनी पीड़िता को ससम्मान वापस काम पर रखने पर भी विचार कर सकती है।

निष्कर्ष: कार्यस्थल पर सुरक्षा और सम्मान सर्वोपरि

विप्रो का यह मामला देश के सभी कॉर्पोरेट घरानों के लिए एक वेक-अप कॉल है। यह दर्शाता है कि प्रताड़ना केवल शारीरिक या यौन रूप में ही नहीं, बल्कि वैचारिक, मानसिक और धार्मिक रूप में भी हो सकती है। किसी भी कर्मचारी को उसकी धार्मिक मान्यताओं के कारण कार्यस्थल पर असुरक्षित महसूस नहीं होना चाहिए।

अब सभी की नजरें विप्रो की आंतरिक समिति की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह मामला न केवल आईटी सेक्टर में कर्मचारियों की सुरक्षा के मानकों को तय करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि भविष्य में कंपनियां धार्मिक और मानसिक प्रताड़ना से जुड़े मामलों से निपटने के लिए अपने आंतरिक नियमों को कितना मजबूत और संवेदनशील बनाती हैं।

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