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भारी पड़ेगा AI का इस्तेमाल, रिसर्च में बड़ा खुलासा
यह जानकारी वास्तव में चौंकाने वाली और चिंताजनक है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे एक बड़ा पर्यावरणीय संकट छिपा हुआ है, जिसे अक्सर "अदृश्य कार्बन और वॉटर फुटप्रिंट" कहा जाता है।
1. एआई और पानी का कनेक्शन: डेटा सेंटर्स को ठंडे रखने की चुनौती
एआई मॉडल जैसे ChatGPT, Claude या Google Gemini को चलाने के लिए विशाल डेटा सेंटर्स की आवश्यकता होती है। इन सेंटर्स में हजारों शक्तिशाली कंप्यूटर (सर्वर और GPUs) चौबीसों घंटे काम करते हैं।
• गर्मी का उत्पादन: जब ये सर्वर भारी मात्रा में डेटा प्रोसेस करते हैं, तो ये अत्यधिक गर्मी पैदा करते हैं।
• कूलिंग सिस्टम : यदि इन सर्वर्स को ठंडा न रखा जाए, तो ये पिघल सकते हैं या क्रैश हो सकते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए चिल्ड वॉटर सिस्टम और इवेपोरेटिव कूलिंग का उपयोग किया जाता है, जिसमें लाखों लीटर साफ पानी भाप बनकर उड़ जाता है।
पानी की खपत का गणित
जैसा कि शोध में बताया गया है, ChatGPT से महज 100 शब्द लिखवाने में लगभग 519 मिलीलीटर पानी खर्च होता है। इसे इस तरह समझें:
• आप जब AI से एक छोटा सा ईमेल या पैराग्राफ लिखवाते हैं, तो आप अनजाने में आधा लीटर से अधिक शुद्ध पानी हवा में उड़ा देते हैं।
• यदि एक यूजर दिन में 10-15 सवाल पूछता है, तो वह अकेले ही कई लीटर पानी की खपत का कारण बनता है। जब इसे वैश्विक स्तर पर करोड़ों यूजर्स से गुणा किया जाता है, तो यह आंकड़ा भयावह रूप ले लेता है।
2. वैश्विक जल संकट और 2027 का अनुमान
शोध के अनुसार, यदि एआई का विस्तार इसी गति से जारी रहा, तो वर्ष 2027 तक ब्रिटेन के वार्षिक भूजल का लगभग आधा हिस्सा केवल एआई डेटा सेंटर्स की प्यास बुझाने में खत्म हो सकता है।
यह स्थिति केवल ब्रिटेन तक सीमित नहीं है:
• अमेरिका में संकट: आईओवा जैसे अमेरिकी राज्यों में, जहां टेक कंपनियों के बड़े डेटा सेंटर्स हैं, स्थानीय निवासियों को गर्मियों में पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि पानी का एक बड़ा हिस्सा सर्वर्स को ठंडा करने में जा रहा है।
• विकासशील देशों पर असर: कई टेक कंपनियां अपने डेटा सेंटर्स को वैश्विक स्तर पर फैला रही हैं। जिन क्षेत्रों में पहले से ही पीने के पानी की कमी है, वहां एआई सेंटर्स का आना स्थानीय समुदायों के लिए जल संकट को और गहरा कर रहा है।
3. बिजली बनाम पानी: एक दोहरी मार
डेटा सेंटर्स न केवल पानी, बल्कि भारी मात्रा में बिजली की भी खपत करते हैं।
1. प्रत्येक खपत: सर्वर्स को सीधे ठंडा रखने के लिए पानी का वाष्पीकरण।
2. परोक्ष खपत: इन सेंटर्स को चलाने के लिए जो बिजली बनती है (विशेषकर थर्मल या हाइड्रोपावर प्लांट्स में), उसके उत्पादन में भी भारी मात्रा में पानी का उपयोग होता है।
एक डरावना अनुमान: कुछ पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि 2027 तक वैश्विक एआई उद्योग की पानी की मांग 4.6 बिलियन से 6.6 बिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंच सकती है, जो कि कई छोटे देशों की कुल वार्षिक पानी की खपत से भी अधिक है।
4. टेक कंपनियों का रुख और उनके दावे
इस आलोचना के बाद Microsoft, Google और Meta जैसी बड़ी कंपनियों ने इस समस्या को स्वीकार किया है और वे निम्नलिखित कदम उठाने का दावा कर रही हैं:
• वॉटर पॉजिटिव बनने का लक्ष्य: कंपनियों ने वादा किया है कि 2030 तक वे जितना पानी इस्तेमाल करेंगी, उससे अधिक पानी (वर्षा जल संचयन या जल निकायों के पुनरुद्धार के जरिए) प्रकृति को वापस लौटाएंगी।
• एयर कूलिंग और लिक्विड कूलिंग: पानी की जगह विशेष रसायनों या हवा के जरिए सर्वर्स को ठंडा करने की नई तकनीकों पर शोध चल रहा है।
• डेटा सेंटर्स का स्थानांतरण: कुछ कंपनियां अपने डेटा सेंटर्स को ठंडे देशों (जैसे नॉर्डिक देश - आइसलैंड, फिनलैंड) में स्थापित कर रही हैं, ताकि प्राकृतिक रूप से सर्वर्स को ठंडा रखा जा सके और पानी की बचत हो।
5. समाधान: हम एक समाज के रूप में क्या कर सकते हैं?
एआई आज के समय की जरूरत बन चुका है, इसे पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है। लेकिन इसके प्रभाव को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
क) तकनीकी स्तर पर:
• सस्टेनेबल एआई : एआई एल्गोरिदम को अधिक कुशल बनाना ताकि वे कम कंप्यूटिंग पावर और कम पानी में काम कर सकें।
• रीसायकल वॉटर का उपयोग: डेटा सेंटर्स में पीने के पानी की जगह औद्योगिक रूप से रीसायकल किए गए पानी या समुद्री पानी (खारे पानी को साफ करके) का उपयोग अनिवार्य किया जाना चाहिए।
ख) नीतिगत स्तर पर :
• सरकारों को डेटा सेंटर्स को मंजूरी देने से पहले कड़े 'वॉटर ऑडिट' नियम लागू करने चाहिए।
• पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) में एआई कंपनियों की पानी की खपत को सार्वजनिक करना अनिवार्य होना चाहिए ।
ग) व्यक्तिगत स्तर पर :
• जिम्मेदारी से उपयोग: हमें एआई का उपयोग केवल तभी करना चाहिए जब वास्तव में आवश्यकता हो। मनोरंजन या बिना वजह की लंबी चैट से बचना चाहिए।
• जागरूकता: तकनीक के इस छिपे हुए पहलू के बारे में समाज में चर्चा होनी चाहिए, ताकि कंपनियों पर पर्यावरण-अनुकूल नीतियां अपनाने का दबाव बने।
निष्कर्ष
यह शोध हमें याद दिलाता है कि "डिजिटल दुनिया" पूरी तरह आभासी नहीं है; इसके तार सीधे हमारी वास्तविक पृथ्वी के संसाधनों से जुड़े हैं। यदि हमने समय रहते एआई के इस 'वॉटर फुटप्रिंट' को नियंत्रित नहीं किया, तो भविष्य में हमें एक ऐसी दुनिया का सामना करना पड़ सकता है जहां तकनीक तो बेहद स्मार्ट होगी, लेकिन पीने के लिए साफ पानी की भारी किल्लत होगी। प्रगति और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अब ऐच्छिक नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गया है।
