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प्लाज्मा का घेरा और ध्वनि से 30 गुना गति: ओरियन कैप्सूल ने रचा इतिहास, चाँद से लौटते समय दी विज्ञान क

11-04-2026

 

नासा के आर्टेमिस-2 मिशन की पृथ्वी पर वापसी केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि इंसानी साहस और इंजीनियरिंग की पराकाष्ठा की एक रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है। जब 'ओरियन' कैप्सूल ने अंतरिक्ष की गहराइयों से निकलकर पृथ्वी के वायुमंडल में कदम रखा, तो वह पल किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था।

 1. मौत की रफ्तार: 40,000 किमी/घंटा

जब ओरियन कैप्सूल चंद्रमा की कक्षा छोड़कर पृथ्वी की ओर बढ़ा, तो गुरुत्वाकर्षण के कारण इसकी गति 40,000 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुँच गई थी।

  तुलना: यह गति ध्वनि की रफ्तार से लगभग 30 गुना ज्यादा थी।

  चुनौती: इतनी तेज गति से वायुमंडल में प्रवेश करना वैसा ही है जैसे कंक्रीट की दीवार से टकराना। यदि कैप्सूल का कोण (Angle) जरा सा भी गलत होता, तो वह या तो अंतरिक्ष में वापस उछल जाता या घर्षण के कारण जलकर खाक हो जाता।

 2. नर्क जैसी गर्मी: 27,000°C का तापमान

वायुमंडल के कणों के साथ हुए भीषण घर्षण ने कैप्सूल के चारों ओर एक आग का गोला बना दिया।

  तापमान: कैप्सूल की बाहरी हीट शील्ड ने 27,000°C तक का तापमान झेला। यह सूर्य की सतह के तापमान (लगभग 5,500°C) से भी कई गुना अधिक और उसकी आंतरिक गर्मी के करीब आधा है।

  प्लाज्मा का घेरा: अत्यधिक गर्मी के कारण हवा आयनित होकर लाल गर्म प्लाज्मा में बदल गई। इस प्लाज्मा ने कैप्सूल को चारों तरफ से घेर लिया, जिससे कंट्रोल रूम का कैप्सूल से रेडियो संपर्क पूरी तरह टूट गया। इसे 'ब्लैकआउट पीरियड' कहा जाता है।

 3. कंट्रोल रूम का वो 'खौफनाक' सन्नाटा

नासा के मिशन कंट्रोल रूम में मौजूद दुनिया के सबसे बेहतरीन वैज्ञानिकों के लिए वे कुछ मिनट सदियों जैसे लंबे थे।

  ब्लैकआउट: जब संचार टूटा, तो किसी को नहीं पता था कि अंदर मौजूद चारों यात्री सुरक्षित हैं या नहीं।

  डर का कारण: क्या हीट शील्ड इतनी गर्मी सह पाएगी? क्या पैराशूट सही समय पर खुलेंगे? इन सवालों ने अनुभवी वैज्ञानिकों के माथे पर भी पसीना ला दिया था।

  प्लाज्मा की चपेट: जब मॉनिटर पर केवल जलते हुए मलबे जैसी लपटें दिख रही थीं, तब पूरे हॉल में मौत जैसा सन्नाटा छा गया था।

 4. फिर गूंजी तालियां: सुरक्षित वापसी

जैसे ही कैप्सूल ने वायुमंडल की सबसे कठिन परत को पार किया और प्लाज्मा का घेरा छंटा, रेडियो सिग्नल वापस आ गए।

  सफलता का संकेत: स्क्रीन पर ओरियन कैप्सूल के तीन विशाल नारंगी और सफेद पैराशूट खुलते ही नासा का कंट्रोल रूम जश्न में डूब गया।

  स्प्लैशडाउन: प्रशांत महासागर की लहरों पर सुरक्षित लैंडिंग ने यह साबित कर दिया कि नासा की 'हीट शील्ड' तकनीक ने अपना काम बखूबी किया है।

 5. यह मिशन क्यों खास था?

आर्टेमिस-2 की इस सफल वापसी ने आर्टेमिस-3 का रास्ता साफ कर दिया है, जिसमें इंसान एक बार फिर चंद्रमा की सतह पर कदम रखेगा।

  इस मिशन ने यह जांचा कि क्या ओरियन कैप्सूल गहरे अंतरिक्ष से आने वाली रेडिएशन और भीषण गर्मी से इंसानों को बचा सकता है।

  यह भविष्य के मंगल मिशनों के लिए भी एक 'ब्लूप्रिंट' साबित हुआ है।

निष्कर्ष:

27,000°C की आग और 40,000 किमी/घंटा की रफ्तार को मात देकर लौटे ये चारों यात्री अब इतिहास के सबसे साहसी नायकों में शुमार हो गए हैं। नासा का यह 'डर' दरअसल उनकी मेहनत और बारीकियों के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक था, जिसने अंततः एक असंभव दिखने वाले कार्य को संभव कर दिखाया।

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