Near Janipur Thana, Phulwari Sharif, Patna
ममता बनर्जी से बगावत कर 22 TMC सांसद राकांपा (NCP) में शामिल, केंद्र में NDA को समर्थन
पश्चिम बंगाल और देश की सियासत में एक ऐसा अभूतपूर्व और ऐतिहासिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ उनकी ही पार्टी के भीतर अब तक का सबसे बड़ा विद्रोह हो गया है। लोकसभा में टीएमसी के 22 मौजूदा सांसदों ने अपनी ही सरकार और पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुली बगावत कर दी है। कानूनी अड़चनों (जैसे दल-बदल विरोधी कानून) से बचने के लिए इन सभी बागी सांसदों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP - राकांपा) का दामन थाम लिया है।
इस पूरे विद्रोह का नेतृत्व टीएमसी के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय कर रहे हैं। इस गुट ने न केवल ममता बनर्जी को झटका दिया है, बल्कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार को बिना शर्त समर्थन देने का भी एलान कर दिया है। इसके साथ ही, बागी गुट ने आने वाले समय में खुद को 'असली टीएमसी' बताते हुए पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न (जोड़ा फूल) पर अपना कानूनी दावा ठोकने की बात कही है।
बगावत की पृष्ठभूमि और सुदीप बंद्योपाध्याय का नेतृत्व
तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के एकाधिकार को लेकर लंबे समय से असंतोष पनप रहा था। पार्टी के कई पुराने और वरिष्ठ नेता खुद को दरकिनार महसूस कर रहे थे। सुदीप बंद्योपाध्याय, जो लंबे समय से दिल्ली में टीएमसी संसदीय दल के नेता के रूप में काम कर रहे थे, इस असंतोष का मुख्य चेहरा बनकर उभरे।
सुदीप बंद्योपाध्याय के नेतृत्व में एकजुट हुए 22 सांसदों का आरोप है कि पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र पूरी तरह से खत्म हो चुका था और फैसले लेते समय जमीन से जुड़े नेताओं की अनदेखी की जा रही थी। इस गुट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रशासनिक शैली और हालिया राजनीतिक निर्णयों पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
एनसीपी (NCP) का दामन क्यों? कानूनी रणनीति का खेल
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत, यदि कोई निर्वाचित सांसद या विधायक अपनी मूल पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। हालांकि, इसमें एक मुख्य प्रावधान (संसद के नियमों और संशोधनों के तहत) यह है कि यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) या उससे अधिक सांसद एक साथ अलग होते हैं और किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होता और उनकी सदस्यता सुरक्षित रहती है।
टीएमसी के कुल सांसदों की संख्या के लिहाज से 22 सांसदों का यह आंकड़ा कानूनी रूप से बेहद सुरक्षित है। इन बागी सांसदों ने किसी नए दल का गठन करने के बजाय एक स्थापित राष्ट्रीय/क्षेत्रीय दल 'नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी' (NCP) में शामिल होने का विकल्प चुना। इस कदम के पीछे दो मुख्य कारण हैं:
1. संसदीय सदस्यता की सुरक्षा: एनसीपी में आधिकारिक विलय के बाद लोकसभा अध्यक्ष के सामने कानूनी रूप से उनकी सदस्यता को चुनौती देना ममता बनर्जी के लिए बेहद मुश्किल हो जाएगा।
2. राष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल: एनसीपी के जरिए इन सांसदों को दिल्ली की राजनीति में एक मजबूत प्लेटफॉर्म मिलेगा, जिसका इस्तेमाल वे ममता बनर्जी के खिलाफ खुलकर कर सकेंगे।
केंद्र में एनडीए (NDA) को समर्थन और राष्ट्रीय राजनीति पर असर
बागी गुट के नेता सुदीप बंद्योपाध्याय ने साफ कर दिया है कि उनका यह 22 सांसदों का धड़ा केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार (NDA) को बाहर से या गठबंधन के हिस्से के रूप में पूरा समर्थन देगा।
• बीजेपी और एनडीए को मजबूती: इस समर्थन के बाद केंद्र में एनडीए सरकार की स्थिति और ज्यादा मजबूत हो जाएगी। संसद के निचले सदन (लोकसभा) में सरकार के पास अब एक बड़ा और नया सहयोगी दल होगा, जिससे विधायी कार्यों को पारित कराना और आसान हो जाएगा।
• विपक्षी एकता को करारा झटका: ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी विरोधी मोर्चे (विपक्षी गठबंधन) की एक प्रमुख धुरी रही हैं। उनके अपने ही घर में लगी इस सेंध ने विपक्षी खेमे के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ दिया है।
'असली टीएमसी' पर दावा: शिवसेना और एनसीपी जैसे घटनाक्रम की पुनरावृत्ति
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और आक्रामक पहलू यह है कि बागी सांसदों ने केवल पार्टी छोड़ने पर ही बस नहीं किया है। सुदीप बंद्योपाध्याय ने एलान किया है कि चूंकि उनके पास पार्टी के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों का एक बड़ा बहुमत है, इसलिए वे चुनाव आयोग के पास जाकर 'असली तृणमूल कांग्रेस' होने का दावा पेश करेंगे।
यह स्थिति देश में हाल ही में हुए कुछ अन्य राजनीतिक घटनाक्रमों जैसी ही दिखती है:
जिस तरह महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे) और एनसीपी (शरद पवार बनाम अजीत पवार) के मामलों में विधायी बहुमत के आधार पर बागी गुटों को असली पार्टी और चुनाव चिह्न मिल गया था, ठीक उसी तर्ज पर अब पश्चिम बंगाल की टीएमसी को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू होने जा रही है।
यदि बागी गुट संगठन के भीतर भी अन्य नेताओं और विधायकों को अपने पाले में लाने में कामयाब रहा, तो ममता बनर्जी के लिए अपनी ही बनाई पार्टी के नाम और चिह्न को बचाना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
पश्चिम बंगाल की राजनीति पर दुर्गागामी प्रभाव
इस बगावत का असर केवल दिल्ली की संसद तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा और तीखा असर पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार और आगामी चुनावों पर पड़ेगा।
• ममता बनर्जी की साख को ठेस: 'दीदी' के नाम से मशहूर ममता बनर्जी को उनकी अदम्य राजनीतिक इच्छाशक्ति और कड़े तेवरों के लिए जाना जाता है। लेकिन उनकी नाक के नीचे से 22 सांसदों का निकल जाना उनकी राजनीतिक पकड़ और खुफिया तंत्र की एक बहुत बड़ी विफलता माना जा रहा है।
• विधायकों में टूट का डर: राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि सांसदों की इस बगावत के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी टीएमसी के कई विधायक (MLAs) पाला बदल सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो राज्य सरकार पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं।
• बीजेपी के लिए नया रास्ता: पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल होने के नाते बीजेपी इस स्थिति का पूरा फायदा उठाएगी। टीएमसी की इस कमजोरी का इस्तेमाल बीजेपी राज्य में ममता बनर्जी के "अजेय" होने के मिथक को तोड़ने के लिए करेगी।
निष्कर्ष
सुदीप बंद्योपाध्याय के नेतृत्व में 22 टीएमसी सांसदों का एनसीपी में शामिल होना और एनडीए को समर्थन देना भारतीय राजनीति के इस दौर की सबसे बड़ी उथल-पुथल में से एक है। ममता बनर्जी के लिए यह उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा होने वाली है। अब देखना यह होगा कि 'दीदी' इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए क्या जवाबी रणनीति अपनाती हैं और चुनाव आयोग में 'असली टीएमसी' की इस जंग का ऊँट किस करवट बैठता है।
