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गोल्ड ज्वेलरी की बिक्री में 15% तक गिरावट के आसार, हल्के गहनों की बढ़ी मांग

23-05-2026

भारत के स्वर्ण आभूषण बाजार के लिए चालू वित्त वर्ष काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल रेटिंग्स की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, सोने की आसमान छूती कीमतों और सरकार द्वारा आयात शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी के कारण चालू वित्त वर्ष में संगठित आभूषण खुदरा विक्रेताओं की बिक्री की मात्रा में 13 से 15 फीसदी तक की भारी गिरावट आ सकती है।

यह गिरावट भारतीय आभूषण उद्योग के लिए पिछले एक दशक (कोविड-19 प्रभावित वित्त वर्ष 2021 को छोड़कर) का सबसे निचला स्तर हो सकती है। हालांकि, चौंकाने वाली बात यह है कि बिक्री घटने के बावजूद, ऊंची कीमतों के कारण ज्वेलर्स की आय और मुनाफे में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।

मांग में ऐतिहासिक गिरावट के प्रमुख कारण

क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, आभूषणों की मांग में इस बड़ी गिरावट के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारक जिम्मेदार हैं:

1. सोने की कीमतों में अभूतपूर्व उछाल

पिछले वित्त वर्ष के दौरान भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई कमजोरी के कारण घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में लगभग 55 फीसदी की भारी तेजी देखी गई है। वर्तमान में, 24 कैरेट सोने की कीमतें लगभग 1,60,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के ऐतिहासिक स्तर के आसपास बनी हुई हैं। इस भारी उछाल ने आम मध्यमवर्गीय उपभोक्ताओं के बजट को पूरी तरह से प्रभावित किया है।

2. आयात शुल्क में रिकॉर्ड वृद्धि

भारत सरकार ने चालू वित्त वर्ष में व्यापार घाटे को नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को रोकने के लिए सोने पर सीमा शुल्क को 6 फीसदी से बढ़ाकर सीधे 15 फीसदी कर दिया है।

आयात का वित्तीय बोझ: पिछले वित्त वर्ष में भारत ने लगभग 720 टन सोने का आयात किया था, जिससे देश से लगभग 72 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा बाहर गई थी। सरकार का यह कदम सोने के आयात को हतोत्साहित करने के लिए उठाया गया है, जिसने बाजार में सोने को और अधिक महंगा बना दिया है।

उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव: हल्के वजन और कम कैरेट का चलन

महंगे सोने ने भारतीय उपभोक्ताओं के पारंपरिक खरीद पैटर्न को पूरी तरह से बदल दिया है। बजट सीमित होने और आभूषणों की कीमतें अत्यधिक होने के कारण ग्राहकों ने अब 'स्मार्ट बाइंग' का रास्ता अपनाया है:

• हल्के वजन के आभूषण: भारी और पारंपरिक गहनों के बजाय लोग अब रोजमर्रा के उपयोग में आने वाले हल्के और आधुनिक डिजाइनों के गहनों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

• कम कैरेट की ओर झुकाव: ग्राहक अब शुद्ध 22 कैरेट आभूषणों के बजाय 16 से 22 कैरेट रेंज वाले कम कैरेट के आभूषणों की खरीद कर रहे हैं, जिससे उनकी मेकिंग कॉस्ट और कुल कीमत कम हो जाती है।

• स्टडेड ज्वेलरी: हीरे, कीमती पत्थरों या मोतियों से जड़े आभूषणों की मांग बढ़ी है क्योंकि इनमें सोने की कुल मात्रा कम लगती है और दिखने में ये आकर्षक होते हैं।

• निवेश का बदलता नजरिया: जहां एक तरफ पारंपरिक आभूषणों की बिक्री में 25% तक की गिरावट देखी गई है, वहीं दूसरी तरफ शुद्ध निवेश के रूप में गोल्ड बार (सिक्के और बिस्कुट) की मांग में 50% से अधिक का उछाल आया है। लोग आभूषणों की मेकिंग फीस देने के बजाय सीधे धातु में निवेश करना बेहतर समझ रहे हैं।

बिक्री घटने के बावजूद ज्वेलर्स की कमाई बढ़ने की उम्मीद क्यों?

क्रिसिल रेटिंग्स की रिपोर्ट में एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आया है। भले ही ज्वेलर्स के पास बिकने वाले सोने का कुल वजन (वॉल्यूम) 13-15% घटकर 620-640 टन पर आने की आशंका है, लेकिन वित्तीय रूप से उनके राजस्व में 20 से 25 फीसदी की मजबूत वृद्धि होने की उम्मीद है। इसके पीछे निम्नलिखित व्यावसायिक कारण हैं:

1. उच्च मूल्य प्राप्ति 

सोने की प्रति ग्राम कीमत बहुत अधिक होने के कारण कम वॉल्यूम बेचने पर भी ज्वेलर्स का कुल टर्नओवर (राजस्व) काफी अधिक रहेगा। इससे उनका 'एब्सोल्यूट एबिटडा' या शुद्ध परिचालन लाभ चालू वित्त वर्ष में 20 फीसदी तक बढ़ सकता है।

2. इन्वेंटरी लाभ 

ज्वेलर्स के पास पहले से जो पुराना स्टॉक (इंवेंटरी) कम कीमतों पर खरीदा हुआ रखा है, मौजूदा समय में उसकी वैल्यू 55% तक बढ़ चुकी है। इस पुराने स्टॉक को मौजूदा ऊंची कीमतों पर बेचने से ज्वेलर्स को भारी मुनाफा मिल रहा है।

3. फ्रेंचाइजी और टियर-2, टियर-3 शहरों में विस्तार

क्रिसिल के अनुसार, देश के बड़े और संगठित ज्वेलर्स अब बहुत सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं। वे भारी निवेश वाले खुद के स्टोर खोलने के बजाय फ्रेंचाइजी मॉडल को अपना रहे हैं। इससे उनकी पूंजी की कार्यकुशलता बढ़ रही है और वे देश के छोटे शहरों (Tier-2 और Tier-3) के बाजारों तक अपनी पहुंच मजबूत कर रहे हैं।

ज्वेलर्स के सामने आने वाली चुनौतियां

कमाई बढ़ने की उम्मीदों के बीच, आभूषण खुदरा विक्रेताओं को कुछ नई परिचालन चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है:

• अधिक इन्वेंटरी होल्डिंग लागत: सोना महंगा होने के कारण स्टोर में उतना ही स्टॉक बनाए रखने के लिए अब ज्वेलर्स को अधिक पूंजी लगानी पड़ रही है। उनका इंवेंटरी होल्डिंग पीरियड 150 दिनों से बढ़कर 160-180 दिन होने का अनुमान है।

• बैंक कर्ज में बढ़ोतरी: उच्च इंवेंटरी लागत के कारण ज्वेलर्स की बैंक ऋणों पर निर्भरता एक-तिहाई तक बढ़ सकती है। हालांकि, मजबूत नकद प्रवाह के कारण उनकी क्रेडिट प्रोफाइल स्थिर बनी रहेगी।

• भारी डिस्काउंट और प्रमोशनल खर्च: बिक्री के वॉल्यूम को बनाए रखने के लिए ज्वेलर्स को ग्राहकों को लुभाने के लिए मेकिंग चार्ज पर भारी छूट और अधिक विज्ञापन खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे उनके ग्रॉस मार्जिन पर आंशिक दबाव देखा जा रहा है।

निष्कर्ष

क्रिसिल रेटिंग्स की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारतीय स्वर्ण बाजार इस समय एक बड़े संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहा है। जहां एक तरफ सरकार की नीतियां और वैश्विक कीमतें आम उपभोक्ताओं को आभूषणों से दूर कर रही हैं और वे हल्के वजन तथा कम कैरेट के विकल्पों की ओर मुड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संगठित क्षेत्र के ज्वेलर्स उच्च मूल्य प्राप्ति और बेहतर वित्तीय प्रबंधन के दम पर इस संकट के बीच भी अपनी कमाई बढ़ाने में सफल हो रहे हैं। आने वाले समय में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव और संभावित सरकारी नियमों पर पूरे उद्योग की नजर रहेगी।

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