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शेख हसीना को 10 साल की सजा: बांग्लादेश के एक युग का कानूनी अंत

03-02-2026

बांग्लादेश की राजनीति में एक युगांतकारी परिवर्तन और कानूनी भूचाल आ गया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिन्होंने डेढ़ दशक तक बांग्लादेश की सत्ता पर एकछत्र राज किया, उन्हें अब सलाखों के पीछे के भविष्य का सामना करना पड़ रहा है। ढाका की एक विशेष अदालत द्वारा सुनाया गया यह फैसला न केवल उनके राजनीतिक करियर के अंत का संकेत है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति पर भी इसके गहरे असर पड़ने वाले हैं।

शेख हसीना को 10 साल की सजा: बांग्लादेश के एक युग का कानूनी अंत

ढाका की विशेष अदालत के न्यायाधीश रोबी-उल आलम द्वारा सुनाया गया यह फैसला बांग्लादेश के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाएगा। शेख हसीना, जो कभी "आयरन लेडी ऑफ बांग्लादेश" के रूप में जानी जाती थीं, अब भ्रष्टाचार के दो संगीन मामलों में दोषी करार दी गई हैं। यह सजा ऐसे समय में आई है जब बांग्लादेश एक कठिन संक्रमण काल से गुजर रहा है।

1. फैसले का मुख्य आधार: भ्रष्टाचार और पद का दुरुपयोग

यह पूरा मामला 'राजुक' (RAJUK) यानी राजधानी विकास प्राधिकरण द्वारा भूखंडों (Plots) के अवैध आवंटन से जुड़ा है।

 * दोहरे मामले: अदालत ने शेख हसीना को भ्रष्टाचार के दो अलग-अलग मामलों में दोषी पाया है। आरोप है कि प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर अपने करीबियों और परिवार के सदस्यों को कौड़ियों के दाम पर बेशकीमती सरकारी जमीनें आवंटित करवाईं।

 * पारिवारिक संलिप्तता: इस फैसले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सजा केवल हसीना तक सीमित नहीं रही। न्यायाधीश ने उनकी दो भतीजियों और एक भतीजे को भी इस साजिश का हिस्सा मानते हुए अलग-अलग अवधि की जेल की सजा सुनाई है। यह दर्शाता है कि अदालत ने इसे "सिस्टमैटिक करप्शन" (प्रणालीगत भ्रष्टाचार) का मामला माना है।

2. अदालती कार्यवाही और 'इन-एब्सेंटिया' फैसला

इस मुकदमे की प्रक्रिया काफी नाटकीय रही। मामले में कुल 16 आरोपी शामिल थे, लेकिन फैसले के दिन अदालत का दृश्य कुछ अलग ही था।

 * अकेला उपस्थित आरोपी: 16 आरोपियों में से केवल खुर्शीद आलम, जो राजुक के वरिष्ठ अधिकारी थे, व्यक्तिगत रूप से अदालत में मौजूद थे। उन पर भ्रष्टाचार को सुविधाजनक बनाने का आरोप है।

 * अनुपस्थिति में सजा: शेख हसीना, जो तख्तापलट के बाद से ही देश से बाहर (वर्तमान में भारत में शरण लिए हुए) हैं, की अनुपस्थिति में ही यह सजा सुनाई गई। बांग्लादेशी कानून के तहत 'इन-एब्सेंटिया' (अनुपस्थिति में) सुनवाई की प्रक्रिया पूरी की गई, जो अब उनकी संभावित प्रत्यर्पण (Extradition) की मांगों को और तेज करेगी।

3. राजनीतिक प्रतिशोध या कानूनी न्याय?

इस सजा के बाद बांग्लादेश में जनमत दो धड़ों में बंट गया है:

 * विरोधियों का तर्क: बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के समर्थकों का कहना है कि यह "देर से मिला न्याय" है। उनका आरोप है कि हसीना के कार्यकाल में विपक्ष को कुचला गया और अरबों डॉलर का गबन हुआ। उनके लिए यह सजा लोकतंत्र की बहाली की दिशा में एक कदम है।

 * अवामी लीग का पक्ष: शेख हसीना की पार्टी, अवामी लीग, ने इस फैसले को "राजनीतिक प्रतिशोध" करार दिया है। उनका कहना है कि वर्तमान अंतरिम सरकार और विशेष अदालतें जानबूझकर उनके नेतृत्व को निशाना बना रही हैं ताकि भविष्य में होने वाले चुनावों से अवामी लीग को बाहर रखा जा सके।

4. भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर प्रभाव

शेख हसीना को सजा मिलने से नई दिल्ली और ढाका के बीच कूटनीतिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं:

 * प्रत्यर्पण का दबाव: अब जबकि हसीना एक "सजायाफ्ता अपराधी" हैं, ढाका की वर्तमान सरकार भारत पर उन्हें वापस भेजने का भारी दबाव डालेगी। भारत के लिए यह एक 'धर्मसंकट' जैसी स्थिति होगी, क्योंकि हसीना भारत की एक विश्वसनीय सहयोगी रही हैं।

 * सुरक्षा चिंताएं: हसीना की अनुपस्थिति में बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों का उभार भारत की सीमा सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है।

5. शेख हसीना की विरासत पर दाग

एक नेता जिसने बांग्लादेश को "अल्प विकसित" श्रेणी से निकालकर "विकासशील" देश बनाने का श्रेय लिया, उसके लिए भ्रष्टाचार में सजा पाना उनकी ऐतिहासिक विरासत को धूमिल करता है। गरीबी उन्मूलन और आर्थिक विकास के उनके दावों पर अब इन भ्रष्टाचार के मामलों की छाया पड़ गई है।

6. आगे की कानूनी राह

क्या शेख हसीना को वास्तव में जेल जाना होगा? यह कई कारकों पर निर्भर करता है:

 * अपील की प्रक्रिया: अवामी लीग के वकील इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकते हैं, लेकिन इसके लिए आरोपी का अदालत में आत्मसमर्पण करना अनिवार्य हो सकता है।

 * अंतरराष्ट्रीय दबाव: यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे "निष्पक्ष सुनवाई" (Fair Trial) नहीं मानता है, तो इस सजा के कार्यान्वयन में अड़चनें आ सकती हैं।

निष्कर्ष

न्यायाधीश रोबी-उल आलम का यह फैसला बांग्लादेश की न्यायपालिका की दृढ़ता का प्रतीक है या सत्ता परिवर्तन के बाद का 'विजेता का न्याय' (Victors' Justice), यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल, 10 साल की यह सजा शेख हसीना के राजनीतिक जीवन के अध्याय पर विराम लगाती दिख रही है। यह दुनिया भर के तानाशाहों और ताकतवर राजनेताओं के लिए एक सबक है कि सत्ता की चमक धुंधली पड़ते ही कानून के हाथ लंबे हो जाते हैं।


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