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ईंधन की महंगाई का नया झटका: पेट्रोल-डीजल के बाद अब CNG की कीमतों में लगी आग
आम जनता के बजट पर महंगाई की मार थमने का नाम नहीं ले रही है। खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा के सामानों की बढ़ती कीमतों के बीच अब परिवहन ईंधन ने आम आदमी की जेब को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतों से परेशान जनता के लिए कभी सीएनजी एक किफायती और सुरक्षित विकल्प हुआ करती थी। लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के बाद अब सीएनजी की कीमतों में भी एक बार फिर से इजाफा कर दिया गया है। ताजा घटनाक्रम में सीएनजी की कीमतों में 1 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी की गई है। हालांकि, शुरुआती तौर पर यह वृद्धि देश की राजधानी दिल्ली में लागू की गई है, लेकिन इतिहास गवाह है कि दिल्ली में दाम बढ़ने के कुछ ही घंटों या दिनों के भीतर देश के बाकी शहरों और राज्यों में भी कीमतें आनुपातिक रूप से बढ़ा दी जाती हैं।
इस बढ़ोतरी के बाद सबसे चिंताजनक बात यह है कि पिछले महज 9 दिनों के भीतर सीएनजी की कीमतों में धीरे-धीरे करके कुल 4 रुपये का भारी इजाफा हो चुका है। यह क्रमिक बढ़ोतरी आम उपभोक्ताओं, विशेषकर ऑटो, टैक्सी और कमर्शियल वाहन चालकों के लिए एक बड़ा वित्तीय बोझ बनकर उभरी है।
9 दिनों का गणित: कब और कितनी बढ़ी कीमतें?
सीएनजी की कीमतों में यह बढ़ोतरी एक झटके में नहीं की गई, बल्कि इसे एक रणनीतिक और क्रमिक तरीके से लागू किया गया है, जिससे उपभोक्ताओं पर इसका तत्काल असर भले ही छोटा लगे, लेकिन संचयी प्रभाव बेहद गंभीर है। पिछले 9 दिनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो कीमतों का ग्राफ कुछ इस तरह बढ़ा है:
1. 15 मई: सीएनजी की कीमत में सीधे 2 रुपये की बढ़ोतरी की गई। इस बढ़ोतरी ने बाजार में आगामी महंगाई के संकेत दे दिए थे।
2. 17 मई: महज दो दिनों के अंतराल के बाद सीएनजी की कीमतों में 1 रुपये का और इजाफा कर दिया गया।
3. 23 मई (आज): एक बार फिर से कीमतों की समीक्षा की गई और इसमें 1 रुपये की ताजा बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इस प्रकार, 15 मई से लेकर 23 मई के बीच यानी महज 9 दिनों के भीतर सीएनजी कुल 4 रुपये महंगी हो चुकी है। यह रफ्तार यह दर्शाती है कि आने वाले समय में ऊर्जा संकट और कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस की वैश्विक कीमतों का असर भारतीय घरेलू बाजार पर कितनी तेजी से पड़ रहा है।
दिल्ली से शुरुआत: बाकी शहरों पर असर की क्रोनोलॉजी
भारत में ईंधन की कीमतों का निर्धारण अक्सर बड़े महानगरों, विशेषकर दिल्ली और मुंबई के आधार पर तय होता है। दिल्ली में इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) सीएनजी की आपूर्ति करती है। जब भी दिल्ली में सीएनजी के दाम बढ़ते हैं, तो उसका सीधा और त्वरित असर उत्तर प्रदेश के एनसीआर क्षेत्रों (जैसे नोएडा, गाजियाबाद, ग्रेटर नोएडा), हरियाणा (गुरुग्राम, फरीदाबाद) और धीरे-धीरे देश के अन्य राज्यों जैसे महाराष्ट्र, गुजरात और बिहार में भी देखने को मिलता है।
चूंकि परिवहन नेटवर्क आपस में जुड़ा हुआ है, इसलिए दिल्ली में दाम बढ़ने के कुछ ही घंटों के भीतर अन्य राज्यों की गैस वितरण कंपनियां (जैसे गेल, महानगर गैस लिमिटेड, या अडानी गैस) भी अपने रेट रिवाइज कर देती हैं। इससे देशव्यापी स्तर पर एक चेन रिएक्शन शुरू हो जाता है, जो अंततः अंतिम उपभोक्ता को प्रभावित करता है।
सीएनजी की बढ़ती कीमतों के पीछे के मुख्य कारण
सीएनजी की कीमतों में इस निरंतर आ रहे उछाल के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारक जिम्मेदार हैं:
• वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव : अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे युद्ध और भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण वैश्विक कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है। भारत अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है।
• रुपये की कमजोरी: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की स्थिति भी ईंधन की कीमतों को प्रभावित करती है। चूंकि गैस का आयात डॉलर में किया जाता है, इसलिए रुपये के कमजोर होने से आयात लागत बढ़ जाती है, जिसका बोझ अंततः जनता पर डाला जाता है।
• घरेलू कर ढांचा : यद्यपि सीएनजी को पर्यावरण अनुकूल माना जाता है, लेकिन इस पर लगने वाले केंद्रीय उत्पाद शुल्क और विभिन्न राज्यों के वैट की दरें भी इसकी अंतिम कीमत को ऊंचा बनाए रखती हैं। सीएनजी को अभी तक जीएसटी के दायरे में नहीं लाया गया है, जिससे विभिन्न राज्यों में इसकी कीमतों में बड़ा अंतर देखने को मिलता है।
आम आदमी और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव
सीएनजी की कीमतों में इस तरह लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था और आम आदमी की रसोई तक पहुंचता है।
1. सार्वजनिक और व्यावसायिक परिवहन पर मार
दिल्ली और एनसीआर समेत देश के अधिकांश बड़े शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था जैसे ऑटो-रिक्शा, टैक्सियां, ऐप-आधारित कैब्स और सिटी बसें पूरी तरह से सीएनजी पर निर्भर हैं। 9 दिनों में 4 रुपये की बढ़ोतरी के बाद इन वाहन चालकों की दैनिक कमाई का एक बड़ा हिस्सा ईंधन पर खर्च होने लगेगा। इसके परिणामस्वरूप:
• ऑटो और कैब यूनियनों द्वारा किराये में बढ़ोतरी की मांग तेज हो जाएगी।
• आम यात्रियों को दैनिक आवागमन के लिए अधिक पैसे खर्च करने होंगे।
2. माल ढुलाई और रसद लागत में वृद्धि
शहरी क्षेत्रों में आवश्यक वस्तुओं जैसे दूध, सब्जियां, फल और अन्य किराना सामानों की आपूर्ति करने वाले छोटे और मध्यम कमर्शियल वाहन मुख्य रूप से सीएनजी से चलते हैं। जब सीएनजी महंगी होती है, तो माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। इसका सीधा असर इन आवश्यक वस्तुओं की खुदरा कीमतों पर पड़ता है, जिससे बाजार में महंगाई और पैर पसारती है।
3. 'हरित ईंधन' के प्रति घटता आकर्षण
सरकार पिछले कई वर्षों से पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए लोगों को सीएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। पेट्रोल-डीजल की तुलना में सीएनजी को हमेशा एक किफायती विकल्प के रूप में देखा गया, जिसके कारण लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों ने अपनी कारों में सीएनजी किट लगवाए। लेकिन अब, यदि सीएनजी की कीमतें भी इसी रफ्तार से पेट्रोल-डीजल के करीब पहुंचती रहीं, तो उपभोक्ताओं के लिए सीएनजी कारें रखना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रह जाएगा। इससे पर्यावरण अनुकूल ईंधनों के प्रति लोगों का मोहभंग हो सकता है।
आगे की राह और निष्कर्ष
सीएनजी की कीमतों में 9 दिनों के भीतर 4 रुपये की यह क्रमिक वृद्धि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आने वाले दिन उपभोक्ताओं के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक गैस की कीमतें स्थिर नहीं होती हैं, तो आने वाले हफ्तों में आम जनता को सीएनजी के कुछ और झटके झेलने पड़ सकते हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार और नीति निर्माताओं को दीर्घकालिक उपायों पर विचार करने की आवश्यकता है:
• जीएसटी के दायरे में लाना: यदि पेट्रोल, डीजल और सीएनजी को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में लाया जाए, तो करों का ढांचा सुव्यवस्थित हो सकता है और उपभोक्ताओं को कीमतों में भारी राहत मिल सकती है।
• घरेलू उत्पादन को बढ़ावा: भारत को अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए घरेलू स्तर पर प्राकृतिक गैस के उत्खनन और उत्पादन को और अधिक तेज करना होगा ताकि विदेशी बाजारों पर निर्भरता कम हो सके।
