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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026: एक नए आर्थिक युग का उदय

03-02-2026

भारत और अमेरिका के बीच हुआ यह व्यापार समझौता (Trade Deal) वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक "ऐतिहासिक मोड़" माना जा रहा है। 2 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत के बाद इस समझौते ने दशकों पुराने व्यापारिक गतिरोधों को दूर कर दिया है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026: एक नए आर्थिक युग का उदय

अमेरिका और भारत के बीच लंबे समय से चल रही तनातनी और टैरिफ युद्ध पर आखिरकार विराम लग गया है। इस समझौते को न केवल आर्थिक लाभ के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि यह चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच एक मजबूत "लोकतांत्रिक आर्थिक धुरी" बनाने की कोशिश भी है। रातों-रात बदली इन चार प्रमुख चीजों ने भारतीय बाजारों और वैश्विक तेल राजनीति को पूरी तरह से प्रभावित किया है।

1. टैरिफ में भारी कटौती: 25% से घटकर 18% हुआ शुल्क

इस डील की सबसे बड़ी और तत्काल राहत भारतीय निर्यातकों के लिए आई है। अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले पारस्परिक टैरिफ (Reciprocal Tariff) को 25% से घटाकर 18% कर दिया है।

 * प्रभाव: पिछले कुछ समय से 'मेड इन इंडिया' उत्पादों पर अमेरिका ने 50% तक के कड़े टैरिफ लगा दिए थे, जिससे भारत के गारमेंट, रत्न-आभूषण, और आईटी सेवाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता घट रही थी। अब 18% की दर के साथ, भारत अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों (जैसे वियतनाम और बांग्लादेश, जिन पर 20% तक टैरिफ है) के मुकाबले बेहतर स्थिति में आ गया है।

 * बाजार की प्रतिक्रिया: इस खबर के बाद भारतीय शेयर बाजार (Nifty 50) ने जबरदस्त उछाल देखा और रुपया भी डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ।

2. रूस-यूक्रेन युद्ध और तेल राजनीति: अतिरिक्त शुल्क की समाप्ति

अमेरिका ने भारत पर लगे उस 25% अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क (Penal Tariff) को भी हटा लिया है, जो भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने के कारण लगाया गया था।

 * बड़ा बदलाव: इसके बदले में भारत ने एक कड़ा फैसला लिया है। भारत अब रूस से कच्चे तेल की खरीद को धीरे-धीरे बंद करेगा और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका तथा वेनेजुएला जैसे देशों की ओर रुख करेगा।

 * रणनीतिक महत्व: राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि यह कदम रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की उनकी रणनीति का हिस्सा है। भारत का रूस से पीछे हटना मास्को के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका होगा, जबकि अमेरिका के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत है।

3. 500 अरब डॉलर का महा-सौदा: "बाय अमेरिकन" पर मुहर

समझौते के तहत भारत अगले कुछ वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर (लगभग 42 लाख करोड़ रुपये) से अधिक मूल्य का सामान खरीदेगा। यह राशि भारत के रक्षा और ऊर्जा बजट के एक बड़े हिस्से के बराबर है।

 * प्रमुख क्षेत्र: इसमें ऊर्जा (LNG), अत्याधुनिक तकनीक (Semiconductors & AI), कृषि उत्पाद, कोयला और नागरिक उड्डयन (हवाई जहाज) शामिल हैं।

 * क्यों महत्वपूर्ण है? अमेरिका हमेशा से भारत के साथ अपने 'व्यापार घाटे' (Trade Deficit) को लेकर चिंतित रहा है। भारत की यह प्रतिबद्धता उस घाटे को कम करेगी और बदले में भारत को अमेरिका की 'क्रिटिकल टेक्नोलॉजी' तक आसान पहुंच मिलेगी।

4. टैरिफ बाधाओं का शून्य (Zero) की ओर बढ़ना

भारत ने आश्वासन दिया है कि वह अमेरिकी वस्तुओं पर अपने टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं (Non-Tariff Barriers) को धीरे-धीरे खत्म कर शून्य तक लाएगा।

 * कृषि और डेयरी: भारत ने अमेरिकी सेब, अखरोट और कुछ डेयरी उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलने की सहमति दी है।

 * ऑटोमोबाइल: अमेरिकी कारों (खासकर हार्ले-डेविडसन और टेस्ला जैसी प्रीमियम ब्रांड्स) पर लगने वाली भारी ड्यूटी को कम किया जाएगा, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं को अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स सस्ते में मिल सकेंगे।

इस डील के दूरगामी परिणाम

1. चीन के लिए कड़ा संदेश: यह समझौता साबित करता है कि भारत अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में चीन का विकल्प बनने के लिए तैयार है। अमेरिका द्वारा भारत को तरजीह देना यह दर्शाता है कि 'फ्रेंड-शोरिंग' (दोस्त देशों के साथ व्यापार) अब वाशिंगटन की प्राथमिकता है।

2. घरेलू उद्योगों पर असर: जहाँ एक ओर निर्यातकों के लिए रास्ते खुले हैं, वहीं भारतीय किसानों और छोटे व्यापारियों (MSMEs) के लिए चुनौती भी बढ़ेगी। अमेरिकी कृषि उत्पादों का शून्य टैरिफ पर भारत आना घरेलू उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा पैदा करेगा। हालांकि, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने आश्वासन दिया है कि संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की रक्षा की जाएगी।

3. ऊर्जा सुरक्षा का नया ढांचा: रूस से दूरी बनाकर अमेरिका से ऊर्जा खरीदना भारत के लिए थोड़ा महंगा हो सकता है, लेकिन यह भारत को पश्चिमी प्रतिबंधों के जोखिम से बचाएगा। साथ ही, अमेरिका से आने वाला कोयला और गैस भारत की बिजली और औद्योगिक मांग को स्थिरता प्रदान करेंगे।

निष्कर्ष

यह ट्रेड डील केवल आयात-निर्यात का आंकड़ा नहीं है, बल्कि "21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारी" की आधारशिला है। भारत ने अपनी गुटनिरपेक्ष छवि से थोड़ा हटकर अमेरिका के साथ आर्थिक रूप से "अलाइन" होने का फैसला किया है। यदि यह योजनाबद्ध तरीके से लागू होता है, तो 2030 तक भारत की जीडीपी में 1-2% की अतिरिक्त वृद्धि देखने को मिल सकती है।


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