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नोटों के कागज का 'सीक्रेट' क्यों पेड़ की छाल से नहीं, 100% कॉटन से बनती है आपकी करेंसी?

25-06-2026

क्या आपने कभी सोचा है कि जेब में रखा नोट पानी में भीगने के बाद भी अखबार या आम कागज की तरह गलकर फट क्यों नहीं जाता? या फिर महीनों-सालों तक सैकड़ों हाथों से गुजरने के बाद भी वह अपनी मजबूती कैसे बनाए रखता है? भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों और वैश्विक मुद्रा मानकों के अनुसार, इसका सीधा जवाब है—नोट का कागज आम कागज नहीं है।

आमतौर पर किताबें, अखबार और कॉपियां बनाने के लिए पेड़ के तनों और छालों से तैयार पल्प (लुगदी) का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, भारत सहित दुनिया भर के अधिकांश देशों की करेंसी नोटों को तैयार करने के लिए 100 प्रतिशत कॉटन (कपास) का उपयोग किया जाता है। नोट बनाने की यह पूरी प्रक्रिया और इसका फॉर्मूला इतना सुरक्षित है कि केंद्रीय बैंक इसे पूरी तरह से गुप्त रखता है।

कॉटन ही क्यों? आम कागज और नोट के कागज में अंतर

1. लंबी शेल्फ लाइफ (सहनशीलता)

आम कागज की तुलना में कॉटन फाइबर से बने कागज की उम्र बेहद लंबी होती है। नोट को लगातार मोड़ा जाता है, जेबों में दबाया जाता है और वह पसीने या पानी के संपर्क में भी आता है। कॉटन में मौजूद 'लिंट' इसे फटने से बचाता है।

2. शानदार छपाई और सुरक्षा फीचर्स

नोटों पर कई तरह के गुप्त सुरक्षा फीचर्स (जैसे वॉटरमार्क, सुरक्षा धागा और उभरी हुई छपाई) होते हैं। कॉटन का पेपर इन सुरक्षा धागों और विशेष स्याही को अपने भीतर इस तरह समाहित कर लेता है कि नकली नोट बनाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

भारत में नोट छपाई की गुप्त प्रक्रिया 

भारतीय रिजर्व बैंक नोट छापने की पूरी प्रक्रिया को देश की सर्वोच्च सुरक्षा के स्तर पर रखता है। नोटों के लिए विशेष कागज और स्याही कहाँ से आती है, और इसका सटीक रासायनिक मिश्रण क्या है, इसे 'टॉप सीक्रेट' माना जाता है।

• कागज और स्याही की आपूर्ति: भारत में नोट छापने के लिए विशेष कागज मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के होशंगाबाद स्थित 'सिक्योरिटी पेपर मिल' (SPM) में तैयार किया जाता है। इसके अलावा, मैसूर (कर्नाटक) और सालबोनी (पश्चिम बंगाल) में भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) की बेहद सुरक्षित प्रेस हैं।

• सुरक्षा के कड़े नियम: प्रेस के भीतर काम करने वाले कर्मचारियों की सख्त चेकिंग होती है और वहां किसी भी प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ले जाना पूरी तरह प्रतिबंधित होता है। नोट के कागज का एक-एक कतरा और स्याही की एक-एक बूंद का हिसाब रखा जाता है।

दुनिया भर का चलन: कॉटन बनाम प्लास्टिक (पॉलिमर) नोट

सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका (डॉलर), ब्रिटेन (पाउंड) और यूरो जोन सहित दुनिया के अधिकांश शक्तिशाली देश अपनी कागजी मुद्रा के लिए कॉटन का ही सहारा लेते हैं। अमेरिकी डॉलर में लगभग 75% कॉटन और 25% लिनेन का मिश्रण होता है।

प्लास्टिक नोटों का नया दौर: पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कुछ देशों ने कागजी नोटों की जगह प्लास्टिक के नोटों को अपनाना शुरू कर दिया है।

• शुरुआत किसने की? ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा देश था जिसने 1988 में पूरी तरह से प्लास्टिक (पॉलिमर) नोटों की शुरुआत की थी।

• कौन-से देश कर रहे इस्तेमाल? आज ऑस्ट्रेलिया के अलावा कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, वियतनाम और रोमानिया जैसे देशों में प्लास्टिक के नोट चलन में हैं।

• फायदे और नुकसान: प्लास्टिक के नोट पूरी तरह से वॉटरप्रूफ होते हैं और इन्हें फाड़ना लगभग नामुमकिन होता है, जिससे इनकी उम्र कॉटन के नोटों से भी ज्यादा होती है। हालांकि, इन्हें मोड़ने में दिक्कत होती है और अत्यधिक गर्मी में इनके सिकुड़ने का खतरा रहता है। यही वजह है कि भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देश में अभी भी कॉटन से बने नोटों को ही सबसे सुरक्षित और व्यावहारिक माना जाता है।

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